Ranjit Digal v. State of Odisha (2024)
तथ्य-परिचय
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यह मामला Orissa High Court का है जिसमें अभियुक्त को जमानत मिली थी लेकिन हाई कोर्ट ने उसे सिर्फ तीन महीने की अवधि के लिए सीमित कर दी थी। Live Law+1
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बाद में Supreme Court of India ने कहा कि जब अभियुक्त को जमानत मिल चुकी है, तो उसे अवधि-बद्ध करना उचित नहीं जब तक विशेष कारण न हों। Drishti Judiciary+1
न्यायालय की व्याख्या
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सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जमानत एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसे एक बार मंजूर किया जाए, उसके ऊपर अनवश्यक अवधि लगाने का प्रावधान न्यायसंगत नहीं है। Live Law+1
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कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत अवधि-बद्ध करने की प्रथा न्यायसिद्ध नहीं है क्योंकि इससे अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अतिरिक्त और अनावश्यक प्रतिबंधों के अधीन किया जा रहा है। Drishti Judiciary
निष्कर्ष / निर्देश
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यदि अभियुक्त जमानत का हकदार पाया गया है, तो हाई कोर्ट या ट्रायल कोर्ट उसे “केवल X महिने” की अवधि के लिए जमानत देने का निर्णय नहीं ले सकता, जब तक कि विशेष कारण न हों।
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वकील इसे इस तरह प्रस्तुत कर सकते हैं कि “अगर जमानत मान्य है, तो उसे सामान्य जमानती अवस्था में छोड़ा जाना चाहिए, न कि एक निर्धारित अवधि के लिए बंधित किया जाना चाहिए”।
वकील-प्रयोग हेतु टिप्स
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“सीमित अवधि की जमानत” का आदेश सही नहीं है और उसे चुनौती दी जा सकती है।
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बेल अर्जी में यह बिंदु उठायें कि अभियुक्त के लिए कोई विशेष अवधि निर्धारित करना उसके स्वतंत्रता हक का अनावश्यक प्रतिबंध है।
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यदि कोर्ट ने अवधि-बद्ध जमानत दी है, तो तुरंत सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में निर्देशित तर्क प्रस्तुत करें।
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