बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

156(3) CrPC के प्अंरार्तथना-पत्र को मजिस्ट्रेट के द्वारा परिवाद के रूप में दर्ज करने के आदेश को चुनौती दी जा सकती है। तथा एफ.आई.आर .दर्ज करनी चाहिये केश-

 

Anmol Singh v. State of Uttar Pradesh

तथ्य-परिचय

  • यह निर्णय Allahabad High Court द्वारा दिया गया था (दिनांक 07.01.2021) जिसमें पक्ष ने § 156(3) CrPC के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी। LegitQuest

  • मूल रूप से वादी ने आवेदन किया था कि पुलिस एफआईआर दर्ज करे क्योंकि कथित कूच (entry), धमकी, आक्रमण आदि के आरोप थे। मजिस्ट्रेट ने आवेदन को शिकायत (complaint) के रूप में दर्ज किया, न कि एफआईआर तथा प्रत्यक्ष जांच का निर्देश दिया। वादी ने इसे चुनौती दी। LegitQuest

न्यायालय की व्याख्या

  • अदालत ने कहा कि § 156(3) CrPC के अंतर्गत जब मजिस्ट्रेट को सूचना (information) मिलती है कि किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) हुआ है, तो मजिस्ट्रेट के सामने विकल्प हैं —

    • आवेदन को खारिज करना;

    • पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच निर्देश देना;

    • आवेदन को शिकायत के रूप में रिकॉर्ड करना तथा § 202 के तहत आगे की प्रक्रिया अपनाना। Elegalix+1

  • मजिस्ट्रेट को अपने आदेश में न्याय-मंशा दिखानी चाहिए, यानी केवल ‘सुन लिया’ कह देना पर्याप्त नहीं है। यानि निर्णय मे “judicial mind” लागू होना चाहिए। Supreme Today+1

  • इस मामले में, आवेदन में तथ्य स्पष्ट थे कि आक्रमण हुआ था, इसलिए मजिस्ट्रेट को एफआईआर निर्देश देना चाहिए था। मजिस्ट्रेट ने यह नहीं किया, इसलिए आदेश में खामी पाई गई। Supreme Today

प्रमुख बिंदु

  • मजिस्ट्रेट का विवेक (discretion) है, किंतु वह मायावी नहीं होना चाहिए; वह रूढ-प्रवृत्ति (routine) से आदेश न दे।

  • यदि आवेदन में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का आशय हो, तो मजिस्ट्रेट को एफआईआर दर्ज कराने निर्देश देना चाहिए।

  • यह निर्णय यह बताता है कि मजिस्ट्रेट का § 156(3) या § 202 के तहत विकल्प है, पर निर्णय लेने में प्रक्रिया-दृष्टिकोण (procedure-based reasoning) आवश्यक है।

विश्लेषण एवं आपके लिए बातें

  • आपके मथुरा क्षेत्र में यदि ऐसी परिस्थिति हो जहाँ मजिस्ट्रेट § 156(3) के अंतर्गत मामला पूछ रहा है, तो इस निर्णय के आधार पर आप तर्क दे सकते हैं कि मजिस्ट्रेट ने विवेक पूर्ण रूप से प्रयोग किया है या नहीं।

  • यदि आदेश सिर्फ ‘शिकायत-केस’ में डालने का है जबकि तथ्य पहला संज्ञेय अपराध दिखाते हैं, तो पक्षकार इस निर्णय से चुनौती कर सकता है।

  • इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि मजिस्ट्रेट को स्वचालित रूप से एफआईआर निर्देश देना जरूरी नहीं है, पर यदि आवेदन योग्य हो, तो उसे निर्देश देना चाहिए और उसकी वजह बतानी चाहिए।


समग्र निष्कर्ष

  • ये तीन निर्णय अलग-अलग विधिक प्रश्नों को छूते हैं — सिविल वादों में प्लेटेंट कारण-ए-कार्रवाई एवं समयसीमा (Dahiben), आपराधिक जाँच में आवाज-नमूना लेने की वैधता (Ritesh Sinha), तथा मजिस्ट्रेट की विवेकी शक्तियों का उपयोग (§ 156(3), § 202 CrPC) (Anmol Singh)।

  • इनके माध्यम से वकील के रूप में आप निम्न बातें कर सकते हैं –

    • सिविल वाद की शुरुआत में ही प्रारंभिक छँटनी (screening) के लिए Order VII Rule 11 का उपयोग।

    • आपराधिक जाँच में तकनीकी साक्ष्यों (voice samples) को समझना और उन्हें चुनौती देना/अनुमोदित करना।

    • मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया-गत विवेक का सही उपयोग एवं आदेश की समीक्षा।

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