बुधवार, 5 नवंबर 2025

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मामले को बहाल किया, कहा कि हाईकोट ने दूल्हे के परिवार के खिलाफ स्पष्ट सबूतों को नजर अंदाज किया

  सुप्री  कोर्ट ने दहेज मामले को बहाल  किया, कहा कि हाईकोट ने दूल्हे के परिवार के खिलाफ स्पष्ट सबूतों को नजरअंदाज  किया  

 शीष अदालत ने इस बात पर फिर से ज़ोर दिया कि उच्च न्यायालयों को सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपनी अंतिनिहत शक्तियों का संयम से प्रयोग करना चाहिए और जब एफआईआर में अपराध के तत्वों का खुलासा करने वाले विशिष्ट, तिथि-आधारित आरोप शामिल हों तो वे आपराधिक कायवाही को रद्द नहीं कर सकते।                                    सर्वोच्च न्यायालय ने एक भावी दूल्हे के पिता, माता और भाई के खिलाफ दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत आपराधिक कायवाही बहाल कर दी है। न्यायालय ने माना  कि दहेज की मांग के विशिष्ट, तिथि आधारित आरोपों के बावजूद  त्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मामला रद्द करके एक "गंभीर गलती" की है।                                सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मामले को बहाल किया, कहा कि हाईकोट ने दूल्हे के परिवार के खिलाफ स्पष्ट सबूतों को नजरअंदाज किया |                                                                                                                                                                       सुप्रीम कोट ने दहेज मामले न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूति ऑगीन जॉज मसीह की पीठ ने 8 अगस्त, 2025 को यह फैसला  सुनाया, जिसमें उच्च न्यायालय के 20 अगस्त, 2024 के आदेश को रद्द कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय   ने कहा कि इस मामले में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा निहित शक्तियों का प्रयोग "न्याय की गंभीर विफलता" का कारण बना।                                                                               मामले की पृष्ठभूमि यह मामला 29 नवंबर, 2016 को अपीलकर्ता कृष्णकांत केदी  द्वारा दर्ज कराई गई एक प्राथिमकी से उत्पन्न हुआ। उन्होने  आरोप लगाया कि उनकी बेटी और पाँचवे प्रतिवादी के बीच विवाह की बातचीत इसलिए टूट गई  क्योकि वह दूल्हे के परिवार  द्वारा की जा रही दहेज की लगातार माँगों को पूरा नहीं कर सके । शिकायत के अनुसार, शादी की बातचीत 2016 मे शुरू हुई थी। 15 अप्रैल, 2016 को दूल्हे ने भावी दुल्हन से मुलाकात की और उससे शादी करने की इच्छा जताई। 4 जून, 2016 को दूल्हे के भाई ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता से 10 लाख रुपये नकद और एक गाड़ी की मांग की।  10 जुलाई 2016 को, तिलक समारोह के दि, शिकायतकर्ता ने दूल्हे के पिता, माता और भाई को 2 लाख रूपये नकद, कपड़े, चांदी के बर्तन और अन्य सामान देने का दावा किया। 21 अगस्त 2016 को, एक फ़ोन कॉल के दौरान, दूल्हे की माँ ने कथित तौर पर 10 लाख रुपये और एक कार की माँग दोहराई। शिकायतकर्ता ने इन माँगों को पूरा करने से इनकार कर दिया, जिसके कारण शादी रद्द कर दी गई।   पुलिस ने इस मामले में 27 मई 2018 को आरोप पत्र दाखिल किया था।                                         उच्च न्यायालय का निर्ण   त्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्राथिमकी की जाँच की और निष्कर्ष निकाला कि दूल्हे के पिता, माता और  भाई के खलाफ आरोप "अस्पष्ट और प्रकृति " थे और दहेज निषेध अधिनयम की धारा 3 और 4 के तहत  प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनते। उच्च न्यायालय ने उनके खलाफ कायवाही रद्द कर दी, लेकिन दूल्हे के खलाफ मामला जारी रखने की अनुमित दे दी।                                                        र्वोच्च न्यायालय के निष्कर्ष सुप्रीम कोट हाई कोर्ट के निष्कर्ष से असहमत था। एफआईआर की समीक्षा के बाद, बेच ने पाया कि इसमें तारीखों और समय के विवरण के साथ विशिष्ट और निश्चित आरोप शामिल थे, जिनमें प्रथम दृष्टया कथित अपराधों के तत्व शामिल थे। नयायालय ने कहा: "एफआईआर को पढ़ने के बाद, हम विशिष्ट और निश्चित आरोप मिलते है, जिनमें तारीखों और समय का विवरण दिया गया है, जिनमे प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व शामिल है... हम आश्चर्य हो रहे है कि और  क्या चाहिए था... हम यह समझने में पूरी तरह असमर्थ है कि एफआईआर को कैसे रद्द किया जा सकता था... यह मानते हुए कि आरोप... अस्पष्ट और प्रकृतिम बहुविल्पीय है।" पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने इतने विस्तृत आरोपों के बावजूद कायवाही रद्द करने में गलती की है। प्रतिवादियों के वकीलों ने दो मुख्य तक प्रस्तुत करके उच्च न्यायालय के आदेश का बचाव करने का प्रयास किया। पहला, न्होने  दावा किया कि शिकायतकर्ता ने विवाह संबंधी बातचीत के दौरान अपनी स्थित को गलत तरीके से प्रस्तुत किया था। दूसरा, न्होने  तर्क दिया कि आपराधिक कायवाही दुभावनापूर्ण थी और उन्होने हरियाणा राज्य बनाम भजनलाल के उदाहरण का हवाला दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों दलीलों को खारिज कर दिया। उसने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपनी स्थित को गलत तरीके से प्रस्तुत किया था या नहीं, यह विशुद्ध रूप से तथ्य का प्रश्न है, जिसका निर्य़ के वल मुकदमे के दौरान ही किया जा सकता है, यदि इसे बचाव पक्ष के रूप में उठाया गया हो। दूसरे बिदु पर, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भजनलाल  श्रेणी के मामलों में, जहाँ कायवाही "स्पष्ट रूप से दुभावना से प्रेरित" थी, यह आवश्यक है कि प्राथिमकी में दुभावना स्पष्ट रूप से दिखाई दे। न्यायालय ने कहा कि यहाँ ऐसी स्थित नहीं है, और किसी भी स्थित ममें, उच्च न्यायालय ने दुभावना के आधार पर प्राथिमकी को रद्द नहीं किया था।                                                                                                                                                       र्वोच्च न्यायालय ने "आलोचना आदेश को बरकरार रखने का कोई आधार न पाते हुए" उसे रद्द कर  दिया। न्यायालय ने दूल्हे के पिता, माता और भाई के खिलाफ दहेज निषेध अधिनयम की धारा 3 और 4 के तहत आपराधिक कायवाही बहाल कर दी और निदेश दिया कि मामले को कानून के अनुसार ताकिक निष्कर्ष तक पहुँचाया जाए। पीठ ने आगे कहा क उसकी किसी भी टिप्पणी से मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्य लेने में निचली अदालत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। उसने ज़ोर देकर कहा कि निचली अदालत को दोनों पक्षों  द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यो और तर्को का स्वतंत्र रूप से मूल्यकन करना चाहिए।                                                                                  केस का शीषक: कृष्णकांत केदी एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य                                                                    निर्य की तिथि: 8 अगस्त, 2025                                                                                             पीठ: न्यायमूति दीपांकर दत्ता और न्यायमूति ऑगीन जॉज मसी

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

PUCL v. State of Maharashtra (2023): पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

 

PUCL v. State of Maharashtra (2023): पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

🔹 पृष्ठभूमि:

यह मामला पुलिस द्वारा मीडिया में जानकारी साझा करने (Press Briefing / Media Disclosure) से जुड़ा था।
कई बार पुलिस जाँच पूरी होने से पहले आरोपी के बारे में मीडिया में बयान देती है — जिससे निष्पक्ष ट्रायल प्रभावित होता है।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश:

  1. Union Ministry of Home Affairs (MHA) को तीन महीनों में मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशा-निर्देशों का मैन्युअल तैयार करने को कहा गया।

  2. सभी राज्यों के DGPs को सुझाव देने के लिए बुलाया गया।

  3. NHRC (मानवाधिकार आयोग) की राय को शामिल करने को कहा गया।


🔹 मुख्य सिद्धांत:

पुलिस और मीडिया दोनों को “Public Right to Know” और “Accused’s Right to Fair Trial” के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।


🔹 उदाहरण:

अगर पुलिस किसी आरोपी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है और उसे अपराधी बताती है, तो यह आरोपी के अधिकारों का हनन है।
इसलिए, अदालत ने कहा — केवल आवश्यक जानकारी ही साझा की जाए, ताकि जाँच प्रभावित न हो।


📘 केस संदर्भ:

People’s Union for Civil Liberties (PUCL) v. State of Maharashtra, Supreme Court, 13 September 2023

Union of India v. Manjurani Routray (2023): कानून की Validity को Challenge करने का नियम

 

🟩 3️⃣ Union of India v. Manjurani Routray (2023): कानून की Validity को Challenge करने का नियम

🔹 केस का विषय:

याचिकाकर्ता ने किसी कानून की संवैधानिक वैधता (Constitutional Validity) को चुनौती दी थी।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

अगर आप किसी कानून या नियम को “Strike Down” करवाना चाहते हैं, तो आपको अपनी Petition में स्पष्ट और विशिष्ट रूप से यह Pleading करनी होगी कि:

  • कौन सा प्रावधान unconstitutional है, और

  • क्यों उसे रद्द किया जाना चाहिए।


🔹 उदाहरण:

अगर कोई कहता है कि “XYZ Rule असंवैधानिक है”, तो उसे यह भी बताना होगा कि कौन सा Fundamental Right इसका उल्लंघन कर रहा है और किस कारण।


🔹 कानूनी प्रभाव:

बिना साफ़ Pleading के, कोर्ट कोई धारा या नियम Ultra Vires (अमान्य) घोषित नहीं करेगा।


📘 केस संदर्भ:

Union of India v. Manjurani Routray, Supreme Court, 1 September 2023

Article 54 – Limitation Act की विस्तृत व्याख्या (Specific Performance मामलों में)

 

🟩 2️⃣ Article 54 – Limitation Act की विस्तृत व्याख्या (Specific Performance मामलों में)

🔹 दो स्थितियाँ:

  1. Performance की तारीख तय है — Limitation तीन साल उसी दिन से शुरू होगी।

  2. Performance की तारीख तय नहीं है — Limitation तीन साल Notice of Refusal से शुरू होगी।


🔹 उदाहरण:

अगर Contract में लिखा है कि “1 January 2021 तक जमीन बेची जाएगी”, तो Suit 1 January 2024 तक डाली जा सकती है।
अगर तारीख नहीं लिखी, और मना 1 March 2022 को किया गया, तो Suit 1 March 2025 तक चलेगा।


📘 इस Article की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने A. Valliammai v. K.P. Murali (2023) में की थी।

A. Valliammai v. K.P. Murali (2023): Specific Performance और Limitation की शुरुआत कब होती है?

 

🟩 1️⃣ A. Valliammai v. K.P. Murali (2023): Specific Performance और Limitation की शुरुआत कब होती है?

🔹 केस का प्रकार:

यह मामला Specific Performance (निश्चित क्रियान्वयन) से जुड़ा है — यानी जब कोई व्यक्ति किसी अनुबंध (Contract) को पूरा करवाने के लिए कोर्ट में वाद दाखिल करता है।


🔹 मुख्य प्रश्न:

अगर Contract में Performance की कोई तारीख तय नहीं है, तो Limitation Period (समयसीमा) कब से शुरू होगी?


⚖️ सुप्रीम कोर्ट का फैसला:

Court ने कहा कि –

जब तक Performance के लिए कोई तय तारीख नहीं है, Limitation Act, 1963 की Article 54 के अनुसार तीन साल की सीमा तभी शुरू होती है जब Plaintiff को पता चलता है कि Defendent ने Performance से इनकार कर दिया (Notice of Refusal)।


🔹 उदाहरण से समझें:

मान लीजिए, आपने किसी से जमीन बेचने का अनुबंध किया, लेकिन उसमें कोई तारीख नहीं लिखी कि बिक्री कब पूरी होगी।
अगर सामने वाला 2022 में मना कर देता है, तो आपका 3 साल का समय 2022 से शुरू होगा, न कि अनुबंध की तारीख से।


🔹 कानूनी महत्व:

यह फैसला उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहाँ अनुबंध में “time not fixed” है।
👉 वादी को यह साबित करना होगा कि मना किए जाने की जानकारी कब मिली।
👉 तभी Limitation शुरू होगी।


📘 संदर्भ:

A. Valliammai v. K.P. Murali, Supreme Court, 12 September 2023
(Interpretation of Article 54, Limitation Act, 1963)

“Santosh Patra v. State of Odisha & Ors. (2025) में यदि आवेदन में कमी है तो उसे सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए, निष्पादन को बंद नहीं किया जाना चाहिए”इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि Order XXI CPC के अंतर्गत “पहली आवेदन की अस्वीकृति = निष्पादन नहीं होगा” यह सिद्धांत नहीं बनता।

 

Santosh Patra v. State of Odisha & Ors. (2025)

तथ्य-परिचय

  • इस मामले में मूल रूप से एक मतदान वाद (money suit) में दायित्व तय हुआ था; उसके बाद निष्पादन (execution) कार्यवाही चल रही थी (Civil Procedure Code, 1908 की Order XXI के अंतर्गत)। CaseMine+1

  • लेकिन निष्पादन आवेदन में तकनीकी कमियाँ थीं — जैसे कि वादी (डिक्री-होल्डर) ने उस राशि का सटीक उल्लेख नहीं किया, सरकारी वाहन/अचल संपत्ति का मूल्यांकन नहीं प्रस्तुत किया आदि। निष्पादन आवेदन को न चलाते हुए कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। Drishti Judiciary

न्यायालय की व्याख्या

  • हाई कोर्ट ने कहा कि Order XXI CPC एक स्व-निहित (self-contained) और स्वतंत्र अध्याय है। इसलिए इसे सामान्य “दायित्व पुनराधिकार (res judicata)” की धारा 11 CPC के तहत नहीं लाया जा सकता। Live Law

  • विशेष रूप से, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पादन कार्यवाही का उद्देश्य डिक्री-होल्डर को उसके निर्णय (decree) के “फल” (fruits) दिलाना है, इसलिए केवल तकनीकी कारणों से निष्पादन बंद नहीं किया जाना चाहिए। Legal Bites

निष्कर्ष / निर्देश

  • निष्पादन कार्यवाही में यदि आवेदन तकनीकी रूप से अधूरा है, तो उसे तुरंत खारिज करना नहीं चाहिए — वादी को मौका देना चाहिए कि वह आवश्यक विवरण जमा करे।

  • निष्पादन को खारिज करना इस आधार पर कि ‘पहले निष्पादन आवेदन खारिज हो गया था’ यह उचित नहीं; नया आवेदन फिर दाखिल किया जा सकता है।

  • इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि Order XXI CPC के अंतर्गत “पहली आवेदन की अस्वीकृति = निष्पादन नहीं होगा” यह सिद्धांत नहीं बनता।

वकील-प्रयोग हेतु टिप्स

  •  “यदि आवेदन में कमी है तो उसे सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए, निष्पादन को बंद नहीं किया जाना चाहिए”।

  • खंडित / अधूरे निष्पादन आवेदन के मामले में, प्रतिवादी द्वारा ‘res judicata’ का तर्क लगाया जाए, तो आप इस केस का हवाला दे सकते हैं कि निष्पादन कार्यवाही में पुनः आवेदन संभव है।

  • ड्राफ्ट तैयार करते समय निष्पादन आवेदन को Order XXI Rule 11 के अनुरूप तैयार करने की सावधानी रखें ताकि तकनीकी खामियाँ न रहें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अभियुक्त जेल में है, तो उसकी पेशी का दायित्व पुलिस/प्रशासन का है — अगर पुलिस लापरवाही करे तो अभियुक्त को उसकी वजह से दण्ड नहीं भुगतना चाहिए केश---Satendra Babu v. State of Uttar Pradesh (2023)।

 

Satendra Babu v. State of Uttar Pradesh (2023)

तथ्य-परिचय

  • इस मामले में अभियुक्त जेल में था और चूंकि पुलिस-प्रशासन ने उसे ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं किया, जिसके कारण ट्रायल या अन्य सुनवाई में देरी हुई। SCC Online+1

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अभियुक्त जेल में है, तो उसकी पेशी का दायित्व पुलिस/प्रशासन का है — अगर पुलिस लापरवाही करे तो अभियुक्त को उसकी वजह से दण्ड नहीं भुगतना चाहिए। Lead India Law+1

न्यायालय की व्याख्या

  • कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अभियुक्त को “बेदखली/दण्ड” नहीं मिलना चाहिए अगर पेशी-अस्वीकार या ट्रायल में देरी उसकी ही गलती नहीं है। SCC Online

  • यह भी कहा गया कि पुलिस द्वारा अभियुक्त को नहीं प्रस्तुत करना, अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं न्यायसुनवाई का अधिकार प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष / निर्देश

  • यदि अभियुक्त जेल में है, तो यह पुलिस कर्मियों की जिम्मेदारी है कि उसे समय-समय पर प्रस्तुत करें।

  • यदि प्रस्तुत नहीं किया गया और उसके कारण अभियुक्त को कोई नुकसान हुआ है (जैसे ट्रायल देरी, जमानत ना मिलना), तो वह उस कारण से प्रभावित नहीं होगा।

  • इस तरह के मामलों में अभियुक्त के वकील को यह तर्क उठाना चाहिए कि “पेशी-अस्वीकृति/प्रस्तुति-विलंब पुलिस-कर्मी की गलती है, न कि अभियुक्त की”।

वकील-प्रयोग हेतु टिप्स

  •  किसी अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट में पेश नहीं किया गया और वह जेल में है, तो आप इस निर्णय को उद्धृत कर सकते हैं।

  • बेल/रिव्यू अर्जी में यह बताना लाभदायक होगा कि “मैं प्रस्तुत नहीं हुआ क्योंकि मुझे पुलिस द्वारा कोर्ट में नहीं लाया गया” — और इसे वजह नहीं बनाकर अभियुक्त पर दोष न लगाया जाए।

  • पुलिस एवं जमानत-प्रक्रिया में देरी पर यह निर्णय वकील के लिए एक मजबूत बँद बना सकता है।

Supreme Court of India ने कहा कि जब अभियुक्त को जमानत मिल चुकी है, तो उसे अवधि-बद्ध करना उचित नहीं जब तक विशेष कारण न हों केशः--Ranjit Digal v. State of Odisha (2024)

 

 Ranjit Digal v. State of Odisha (2024)

तथ्य-परिचय

  • यह मामला Orissa High Court का है जिसमें अभियुक्त को जमानत मिली थी लेकिन हाई कोर्ट ने उसे सिर्फ तीन महीने की अवधि के लिए सीमित कर दी थी। Live Law+1

  • बाद में Supreme Court of India ने कहा कि जब अभियुक्त को जमानत मिल चुकी है, तो उसे अवधि-बद्ध करना उचित नहीं जब तक विशेष कारण न हों। Drishti Judiciary+1

न्यायालय की व्याख्या

  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जमानत एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसे एक बार मंजूर किया जाए, उसके ऊपर अनवश्यक अवधि लगाने का प्रावधान न्यायसंगत नहीं है। Live Law+1

  • कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत अवधि-बद्ध करने की प्रथा न्यायसिद्ध नहीं है क्योंकि इससे अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अतिरिक्त और अनावश्यक प्रतिबंधों के अधीन किया जा रहा है। Drishti Judiciary

निष्कर्ष / निर्देश

  • यदि अभियुक्त जमानत का हकदार पाया गया है, तो हाई कोर्ट या ट्रायल कोर्ट उसे “केवल X महिने” की अवधि के लिए जमानत देने का निर्णय नहीं ले सकता, जब तक कि विशेष कारण न हों।

  • वकील इसे इस तरह प्रस्तुत कर सकते हैं कि “अगर जमानत मान्य है, तो उसे सामान्य जमानती अवस्था में छोड़ा जाना चाहिए, न कि एक निर्धारित अवधि के लिए बंधित किया जाना चाहिए”।

वकील-प्रयोग हेतु टिप्स

  • “सीमित अवधि की जमानत” का आदेश सही नहीं है और उसे चुनौती दी जा सकती है।

  • बेल अर्जी में यह बिंदु उठायें कि अभियुक्त के लिए कोई विशेष अवधि निर्धारित करना उसके स्वतंत्रता हक का अनावश्यक प्रतिबंध है।

  • यदि कोर्ट ने अवधि-बद्ध जमानत दी है, तो तुरंत सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में निर्देशित तर्क प्रस्तुत करें।

Central Bureau of Investigation v. Dr R.R. Kishore (2023)-कोर्ट ने कहा कि जब कोई कानून संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, यानी वह Part III (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो उसे मात्र आगे से नहीं, बल्कि उसके लागू होने के दिन से ही अवैध एवं अमल नहीं किया जाने योग्य माना जाएगा

 

Central Bureau of Investigation v. Dr R.R. Kishore (2023)

तथ्य-परिचय

  • मामला यह था कि Central Bureau of Investigation (CBI) ने Dr R.R. Kishore नामक व्यक्ति के विरुद्ध भ्रष्टाचार प्रतिबंधक अधिनियम (Prevention of Corruption Act, 1988) के अंतर्गत कार्रवाई की थी। CaseMine+2Indian Kanoon+2

  • विवाद यह था कि Delhi Special Police Establishment Act, 1946 (DSPE Act) की धारा 6A(1) के अंतर्गत यह प्रावधान था कि केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना उस स्तर (Joint Secretary एवं ऊपर) के अधिकारियों के विरुद्ध जाँच/अन्वेषण नहीं किया जा सकता। CaseMine+2Verdictum+2

  • इस प्रावधान के विरुद्ध पहले भी उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट में विवाद था कि यह संवैधानिक रूप से ठीक है या नहीं, विशेषकर समानता अधिकार (Article 14) एवं अन्य मौलिक अधिकारों के संदर्भ में। Verdictum+1

  • सुप्रीम कोर्ट ने 11 सितंबर 2023 को यह निर्णय दिया कि धारा 6A(1) असंवैधानिक है और उसे शुरुआत से (void ab initio) लागू माना जाना चाहिए। CaseMine+2CaseMine+2

न्यायालय की व्याख्या

  • कोर्ट ने कहा कि जब कोई कानून संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, यानी वह Part III (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो उसे मात्र आगे से नहीं, बल्कि उसके लागू होने के दिन से ही अवैध एवं अमल नहीं किया जाने योग्य माना जाएगा। Lexology+1

  • इस तरह की घोषित असंवैधानिकता का प्रभाव पीछे तक जाता है — मतलब, उस कानून द्वारा किए गए प्रावधान/अन्वेषण/ कार्रवाई भी प्रभावित हो सकते हैं। Metalegal Advocates

  • कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की अवधारणा (retrospective invalidity) Article 20(1) (केवल दण्ड से संबंधित) के अंतर्गत नहीं आती क्योंकि यह मामला जाँच-अन्वेषण का था, न कि सीधे विवेचना के बाद सजा देने का। Scribd

निष्कर्ष / निर्देश

  • धारा 6A(1) DSPE Act को लागू दिन से ही अमान्य माना गया। अर्थात्- जो भी कार्रवाई इस धारा के प्रावधान के आधार पर की गई थी, उस पर सवाल उठ सकता है। sadalawpublications.com+1

  • इस प्रकार, यदि कोई सरकारी/अधिकारिक कार्रवाई हुई है जिसमें पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई हो, तो अभियुक्त/संलग्न पक्ष उसे चुनौती दे सकता है कि धारा ही वैध नहीं थी।

  • न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक न्याय के लिए “जो गलत था उसे पीछे से ठीक करना” संभव है।

 

156(3) CrPC के प्अंरार्तथना-पत्र को मजिस्ट्रेट के द्वारा परिवाद के रूप में दर्ज करने के आदेश को चुनौती दी जा सकती है। तथा एफ.आई.आर .दर्ज करनी चाहिये केश-

 

Anmol Singh v. State of Uttar Pradesh

तथ्य-परिचय

  • यह निर्णय Allahabad High Court द्वारा दिया गया था (दिनांक 07.01.2021) जिसमें पक्ष ने § 156(3) CrPC के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी। LegitQuest

  • मूल रूप से वादी ने आवेदन किया था कि पुलिस एफआईआर दर्ज करे क्योंकि कथित कूच (entry), धमकी, आक्रमण आदि के आरोप थे। मजिस्ट्रेट ने आवेदन को शिकायत (complaint) के रूप में दर्ज किया, न कि एफआईआर तथा प्रत्यक्ष जांच का निर्देश दिया। वादी ने इसे चुनौती दी। LegitQuest

न्यायालय की व्याख्या

  • अदालत ने कहा कि § 156(3) CrPC के अंतर्गत जब मजिस्ट्रेट को सूचना (information) मिलती है कि किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) हुआ है, तो मजिस्ट्रेट के सामने विकल्प हैं —

    • आवेदन को खारिज करना;

    • पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच निर्देश देना;

    • आवेदन को शिकायत के रूप में रिकॉर्ड करना तथा § 202 के तहत आगे की प्रक्रिया अपनाना। Elegalix+1

  • मजिस्ट्रेट को अपने आदेश में न्याय-मंशा दिखानी चाहिए, यानी केवल ‘सुन लिया’ कह देना पर्याप्त नहीं है। यानि निर्णय मे “judicial mind” लागू होना चाहिए। Supreme Today+1

  • इस मामले में, आवेदन में तथ्य स्पष्ट थे कि आक्रमण हुआ था, इसलिए मजिस्ट्रेट को एफआईआर निर्देश देना चाहिए था। मजिस्ट्रेट ने यह नहीं किया, इसलिए आदेश में खामी पाई गई। Supreme Today

प्रमुख बिंदु

  • मजिस्ट्रेट का विवेक (discretion) है, किंतु वह मायावी नहीं होना चाहिए; वह रूढ-प्रवृत्ति (routine) से आदेश न दे।

  • यदि आवेदन में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का आशय हो, तो मजिस्ट्रेट को एफआईआर दर्ज कराने निर्देश देना चाहिए।

  • यह निर्णय यह बताता है कि मजिस्ट्रेट का § 156(3) या § 202 के तहत विकल्प है, पर निर्णय लेने में प्रक्रिया-दृष्टिकोण (procedure-based reasoning) आवश्यक है।

विश्लेषण एवं आपके लिए बातें

  • आपके मथुरा क्षेत्र में यदि ऐसी परिस्थिति हो जहाँ मजिस्ट्रेट § 156(3) के अंतर्गत मामला पूछ रहा है, तो इस निर्णय के आधार पर आप तर्क दे सकते हैं कि मजिस्ट्रेट ने विवेक पूर्ण रूप से प्रयोग किया है या नहीं।

  • यदि आदेश सिर्फ ‘शिकायत-केस’ में डालने का है जबकि तथ्य पहला संज्ञेय अपराध दिखाते हैं, तो पक्षकार इस निर्णय से चुनौती कर सकता है।

  • इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि मजिस्ट्रेट को स्वचालित रूप से एफआईआर निर्देश देना जरूरी नहीं है, पर यदि आवेदन योग्य हो, तो उसे निर्देश देना चाहिए और उसकी वजह बतानी चाहिए।


समग्र निष्कर्ष

  • ये तीन निर्णय अलग-अलग विधिक प्रश्नों को छूते हैं — सिविल वादों में प्लेटेंट कारण-ए-कार्रवाई एवं समयसीमा (Dahiben), आपराधिक जाँच में आवाज-नमूना लेने की वैधता (Ritesh Sinha), तथा मजिस्ट्रेट की विवेकी शक्तियों का उपयोग (§ 156(3), § 202 CrPC) (Anmol Singh)।

  • इनके माध्यम से वकील के रूप में आप निम्न बातें कर सकते हैं –

    • सिविल वाद की शुरुआत में ही प्रारंभिक छँटनी (screening) के लिए Order VII Rule 11 का उपयोग।

    • आपराधिक जाँच में तकनीकी साक्ष्यों (voice samples) को समझना और उन्हें चुनौती देना/अनुमोदित करना।

    • मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया-गत विवेक का सही उपयोग एवं आदेश की समीक्षा।

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