बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

PUCL v. State of Maharashtra (2023): पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

 

PUCL v. State of Maharashtra (2023): पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

🔹 पृष्ठभूमि:

यह मामला पुलिस द्वारा मीडिया में जानकारी साझा करने (Press Briefing / Media Disclosure) से जुड़ा था।
कई बार पुलिस जाँच पूरी होने से पहले आरोपी के बारे में मीडिया में बयान देती है — जिससे निष्पक्ष ट्रायल प्रभावित होता है।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश:

  1. Union Ministry of Home Affairs (MHA) को तीन महीनों में मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशा-निर्देशों का मैन्युअल तैयार करने को कहा गया।

  2. सभी राज्यों के DGPs को सुझाव देने के लिए बुलाया गया।

  3. NHRC (मानवाधिकार आयोग) की राय को शामिल करने को कहा गया।


🔹 मुख्य सिद्धांत:

पुलिस और मीडिया दोनों को “Public Right to Know” और “Accused’s Right to Fair Trial” के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।


🔹 उदाहरण:

अगर पुलिस किसी आरोपी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है और उसे अपराधी बताती है, तो यह आरोपी के अधिकारों का हनन है।
इसलिए, अदालत ने कहा — केवल आवश्यक जानकारी ही साझा की जाए, ताकि जाँच प्रभावित न हो।


📘 केस संदर्भ:

People’s Union for Civil Liberties (PUCL) v. State of Maharashtra, Supreme Court, 13 September 2023

Union of India v. Manjurani Routray (2023): कानून की Validity को Challenge करने का नियम

 

🟩 3️⃣ Union of India v. Manjurani Routray (2023): कानून की Validity को Challenge करने का नियम

🔹 केस का विषय:

याचिकाकर्ता ने किसी कानून की संवैधानिक वैधता (Constitutional Validity) को चुनौती दी थी।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

अगर आप किसी कानून या नियम को “Strike Down” करवाना चाहते हैं, तो आपको अपनी Petition में स्पष्ट और विशिष्ट रूप से यह Pleading करनी होगी कि:

  • कौन सा प्रावधान unconstitutional है, और

  • क्यों उसे रद्द किया जाना चाहिए।


🔹 उदाहरण:

अगर कोई कहता है कि “XYZ Rule असंवैधानिक है”, तो उसे यह भी बताना होगा कि कौन सा Fundamental Right इसका उल्लंघन कर रहा है और किस कारण।


🔹 कानूनी प्रभाव:

बिना साफ़ Pleading के, कोर्ट कोई धारा या नियम Ultra Vires (अमान्य) घोषित नहीं करेगा।


📘 केस संदर्भ:

Union of India v. Manjurani Routray, Supreme Court, 1 September 2023

Article 54 – Limitation Act की विस्तृत व्याख्या (Specific Performance मामलों में)

 

🟩 2️⃣ Article 54 – Limitation Act की विस्तृत व्याख्या (Specific Performance मामलों में)

🔹 दो स्थितियाँ:

  1. Performance की तारीख तय है — Limitation तीन साल उसी दिन से शुरू होगी।

  2. Performance की तारीख तय नहीं है — Limitation तीन साल Notice of Refusal से शुरू होगी।


🔹 उदाहरण:

अगर Contract में लिखा है कि “1 January 2021 तक जमीन बेची जाएगी”, तो Suit 1 January 2024 तक डाली जा सकती है।
अगर तारीख नहीं लिखी, और मना 1 March 2022 को किया गया, तो Suit 1 March 2025 तक चलेगा।


📘 इस Article की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने A. Valliammai v. K.P. Murali (2023) में की थी।

A. Valliammai v. K.P. Murali (2023): Specific Performance और Limitation की शुरुआत कब होती है?

 

🟩 1️⃣ A. Valliammai v. K.P. Murali (2023): Specific Performance और Limitation की शुरुआत कब होती है?

🔹 केस का प्रकार:

यह मामला Specific Performance (निश्चित क्रियान्वयन) से जुड़ा है — यानी जब कोई व्यक्ति किसी अनुबंध (Contract) को पूरा करवाने के लिए कोर्ट में वाद दाखिल करता है।


🔹 मुख्य प्रश्न:

अगर Contract में Performance की कोई तारीख तय नहीं है, तो Limitation Period (समयसीमा) कब से शुरू होगी?


⚖️ सुप्रीम कोर्ट का फैसला:

Court ने कहा कि –

जब तक Performance के लिए कोई तय तारीख नहीं है, Limitation Act, 1963 की Article 54 के अनुसार तीन साल की सीमा तभी शुरू होती है जब Plaintiff को पता चलता है कि Defendent ने Performance से इनकार कर दिया (Notice of Refusal)।


🔹 उदाहरण से समझें:

मान लीजिए, आपने किसी से जमीन बेचने का अनुबंध किया, लेकिन उसमें कोई तारीख नहीं लिखी कि बिक्री कब पूरी होगी।
अगर सामने वाला 2022 में मना कर देता है, तो आपका 3 साल का समय 2022 से शुरू होगा, न कि अनुबंध की तारीख से।


🔹 कानूनी महत्व:

यह फैसला उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहाँ अनुबंध में “time not fixed” है।
👉 वादी को यह साबित करना होगा कि मना किए जाने की जानकारी कब मिली।
👉 तभी Limitation शुरू होगी।


📘 संदर्भ:

A. Valliammai v. K.P. Murali, Supreme Court, 12 September 2023
(Interpretation of Article 54, Limitation Act, 1963)

“Santosh Patra v. State of Odisha & Ors. (2025) में यदि आवेदन में कमी है तो उसे सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए, निष्पादन को बंद नहीं किया जाना चाहिए”इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि Order XXI CPC के अंतर्गत “पहली आवेदन की अस्वीकृति = निष्पादन नहीं होगा” यह सिद्धांत नहीं बनता।

 

Santosh Patra v. State of Odisha & Ors. (2025)

तथ्य-परिचय

  • इस मामले में मूल रूप से एक मतदान वाद (money suit) में दायित्व तय हुआ था; उसके बाद निष्पादन (execution) कार्यवाही चल रही थी (Civil Procedure Code, 1908 की Order XXI के अंतर्गत)। CaseMine+1

  • लेकिन निष्पादन आवेदन में तकनीकी कमियाँ थीं — जैसे कि वादी (डिक्री-होल्डर) ने उस राशि का सटीक उल्लेख नहीं किया, सरकारी वाहन/अचल संपत्ति का मूल्यांकन नहीं प्रस्तुत किया आदि। निष्पादन आवेदन को न चलाते हुए कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। Drishti Judiciary

न्यायालय की व्याख्या

  • हाई कोर्ट ने कहा कि Order XXI CPC एक स्व-निहित (self-contained) और स्वतंत्र अध्याय है। इसलिए इसे सामान्य “दायित्व पुनराधिकार (res judicata)” की धारा 11 CPC के तहत नहीं लाया जा सकता। Live Law

  • विशेष रूप से, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पादन कार्यवाही का उद्देश्य डिक्री-होल्डर को उसके निर्णय (decree) के “फल” (fruits) दिलाना है, इसलिए केवल तकनीकी कारणों से निष्पादन बंद नहीं किया जाना चाहिए। Legal Bites

निष्कर्ष / निर्देश

  • निष्पादन कार्यवाही में यदि आवेदन तकनीकी रूप से अधूरा है, तो उसे तुरंत खारिज करना नहीं चाहिए — वादी को मौका देना चाहिए कि वह आवश्यक विवरण जमा करे।

  • निष्पादन को खारिज करना इस आधार पर कि ‘पहले निष्पादन आवेदन खारिज हो गया था’ यह उचित नहीं; नया आवेदन फिर दाखिल किया जा सकता है।

  • इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि Order XXI CPC के अंतर्गत “पहली आवेदन की अस्वीकृति = निष्पादन नहीं होगा” यह सिद्धांत नहीं बनता।

वकील-प्रयोग हेतु टिप्स

  •  “यदि आवेदन में कमी है तो उसे सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए, निष्पादन को बंद नहीं किया जाना चाहिए”।

  • खंडित / अधूरे निष्पादन आवेदन के मामले में, प्रतिवादी द्वारा ‘res judicata’ का तर्क लगाया जाए, तो आप इस केस का हवाला दे सकते हैं कि निष्पादन कार्यवाही में पुनः आवेदन संभव है।

  • ड्राफ्ट तैयार करते समय निष्पादन आवेदन को Order XXI Rule 11 के अनुरूप तैयार करने की सावधानी रखें ताकि तकनीकी खामियाँ न रहें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अभियुक्त जेल में है, तो उसकी पेशी का दायित्व पुलिस/प्रशासन का है — अगर पुलिस लापरवाही करे तो अभियुक्त को उसकी वजह से दण्ड नहीं भुगतना चाहिए केश---Satendra Babu v. State of Uttar Pradesh (2023)।

 

Satendra Babu v. State of Uttar Pradesh (2023)

तथ्य-परिचय

  • इस मामले में अभियुक्त जेल में था और चूंकि पुलिस-प्रशासन ने उसे ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं किया, जिसके कारण ट्रायल या अन्य सुनवाई में देरी हुई। SCC Online+1

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अभियुक्त जेल में है, तो उसकी पेशी का दायित्व पुलिस/प्रशासन का है — अगर पुलिस लापरवाही करे तो अभियुक्त को उसकी वजह से दण्ड नहीं भुगतना चाहिए। Lead India Law+1

न्यायालय की व्याख्या

  • कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अभियुक्त को “बेदखली/दण्ड” नहीं मिलना चाहिए अगर पेशी-अस्वीकार या ट्रायल में देरी उसकी ही गलती नहीं है। SCC Online

  • यह भी कहा गया कि पुलिस द्वारा अभियुक्त को नहीं प्रस्तुत करना, अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं न्यायसुनवाई का अधिकार प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष / निर्देश

  • यदि अभियुक्त जेल में है, तो यह पुलिस कर्मियों की जिम्मेदारी है कि उसे समय-समय पर प्रस्तुत करें।

  • यदि प्रस्तुत नहीं किया गया और उसके कारण अभियुक्त को कोई नुकसान हुआ है (जैसे ट्रायल देरी, जमानत ना मिलना), तो वह उस कारण से प्रभावित नहीं होगा।

  • इस तरह के मामलों में अभियुक्त के वकील को यह तर्क उठाना चाहिए कि “पेशी-अस्वीकृति/प्रस्तुति-विलंब पुलिस-कर्मी की गलती है, न कि अभियुक्त की”।

वकील-प्रयोग हेतु टिप्स

  •  किसी अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट में पेश नहीं किया गया और वह जेल में है, तो आप इस निर्णय को उद्धृत कर सकते हैं।

  • बेल/रिव्यू अर्जी में यह बताना लाभदायक होगा कि “मैं प्रस्तुत नहीं हुआ क्योंकि मुझे पुलिस द्वारा कोर्ट में नहीं लाया गया” — और इसे वजह नहीं बनाकर अभियुक्त पर दोष न लगाया जाए।

  • पुलिस एवं जमानत-प्रक्रिया में देरी पर यह निर्णय वकील के लिए एक मजबूत बँद बना सकता है।

Supreme Court of India ने कहा कि जब अभियुक्त को जमानत मिल चुकी है, तो उसे अवधि-बद्ध करना उचित नहीं जब तक विशेष कारण न हों केशः--Ranjit Digal v. State of Odisha (2024)

 

 Ranjit Digal v. State of Odisha (2024)

तथ्य-परिचय

  • यह मामला Orissa High Court का है जिसमें अभियुक्त को जमानत मिली थी लेकिन हाई कोर्ट ने उसे सिर्फ तीन महीने की अवधि के लिए सीमित कर दी थी। Live Law+1

  • बाद में Supreme Court of India ने कहा कि जब अभियुक्त को जमानत मिल चुकी है, तो उसे अवधि-बद्ध करना उचित नहीं जब तक विशेष कारण न हों। Drishti Judiciary+1

न्यायालय की व्याख्या

  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जमानत एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसे एक बार मंजूर किया जाए, उसके ऊपर अनवश्यक अवधि लगाने का प्रावधान न्यायसंगत नहीं है। Live Law+1

  • कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत अवधि-बद्ध करने की प्रथा न्यायसिद्ध नहीं है क्योंकि इससे अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अतिरिक्त और अनावश्यक प्रतिबंधों के अधीन किया जा रहा है। Drishti Judiciary

निष्कर्ष / निर्देश

  • यदि अभियुक्त जमानत का हकदार पाया गया है, तो हाई कोर्ट या ट्रायल कोर्ट उसे “केवल X महिने” की अवधि के लिए जमानत देने का निर्णय नहीं ले सकता, जब तक कि विशेष कारण न हों।

  • वकील इसे इस तरह प्रस्तुत कर सकते हैं कि “अगर जमानत मान्य है, तो उसे सामान्य जमानती अवस्था में छोड़ा जाना चाहिए, न कि एक निर्धारित अवधि के लिए बंधित किया जाना चाहिए”।

वकील-प्रयोग हेतु टिप्स

  • “सीमित अवधि की जमानत” का आदेश सही नहीं है और उसे चुनौती दी जा सकती है।

  • बेल अर्जी में यह बिंदु उठायें कि अभियुक्त के लिए कोई विशेष अवधि निर्धारित करना उसके स्वतंत्रता हक का अनावश्यक प्रतिबंध है।

  • यदि कोर्ट ने अवधि-बद्ध जमानत दी है, तो तुरंत सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में निर्देशित तर्क प्रस्तुत करें।

Central Bureau of Investigation v. Dr R.R. Kishore (2023)-कोर्ट ने कहा कि जब कोई कानून संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, यानी वह Part III (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो उसे मात्र आगे से नहीं, बल्कि उसके लागू होने के दिन से ही अवैध एवं अमल नहीं किया जाने योग्य माना जाएगा

 

Central Bureau of Investigation v. Dr R.R. Kishore (2023)

तथ्य-परिचय

  • मामला यह था कि Central Bureau of Investigation (CBI) ने Dr R.R. Kishore नामक व्यक्ति के विरुद्ध भ्रष्टाचार प्रतिबंधक अधिनियम (Prevention of Corruption Act, 1988) के अंतर्गत कार्रवाई की थी। CaseMine+2Indian Kanoon+2

  • विवाद यह था कि Delhi Special Police Establishment Act, 1946 (DSPE Act) की धारा 6A(1) के अंतर्गत यह प्रावधान था कि केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना उस स्तर (Joint Secretary एवं ऊपर) के अधिकारियों के विरुद्ध जाँच/अन्वेषण नहीं किया जा सकता। CaseMine+2Verdictum+2

  • इस प्रावधान के विरुद्ध पहले भी उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट में विवाद था कि यह संवैधानिक रूप से ठीक है या नहीं, विशेषकर समानता अधिकार (Article 14) एवं अन्य मौलिक अधिकारों के संदर्भ में। Verdictum+1

  • सुप्रीम कोर्ट ने 11 सितंबर 2023 को यह निर्णय दिया कि धारा 6A(1) असंवैधानिक है और उसे शुरुआत से (void ab initio) लागू माना जाना चाहिए। CaseMine+2CaseMine+2

न्यायालय की व्याख्या

  • कोर्ट ने कहा कि जब कोई कानून संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, यानी वह Part III (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो उसे मात्र आगे से नहीं, बल्कि उसके लागू होने के दिन से ही अवैध एवं अमल नहीं किया जाने योग्य माना जाएगा। Lexology+1

  • इस तरह की घोषित असंवैधानिकता का प्रभाव पीछे तक जाता है — मतलब, उस कानून द्वारा किए गए प्रावधान/अन्वेषण/ कार्रवाई भी प्रभावित हो सकते हैं। Metalegal Advocates

  • कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की अवधारणा (retrospective invalidity) Article 20(1) (केवल दण्ड से संबंधित) के अंतर्गत नहीं आती क्योंकि यह मामला जाँच-अन्वेषण का था, न कि सीधे विवेचना के बाद सजा देने का। Scribd

निष्कर्ष / निर्देश

  • धारा 6A(1) DSPE Act को लागू दिन से ही अमान्य माना गया। अर्थात्- जो भी कार्रवाई इस धारा के प्रावधान के आधार पर की गई थी, उस पर सवाल उठ सकता है। sadalawpublications.com+1

  • इस प्रकार, यदि कोई सरकारी/अधिकारिक कार्रवाई हुई है जिसमें पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई हो, तो अभियुक्त/संलग्न पक्ष उसे चुनौती दे सकता है कि धारा ही वैध नहीं थी।

  • न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक न्याय के लिए “जो गलत था उसे पीछे से ठीक करना” संभव है।

 

156(3) CrPC के प्अंरार्तथना-पत्र को मजिस्ट्रेट के द्वारा परिवाद के रूप में दर्ज करने के आदेश को चुनौती दी जा सकती है। तथा एफ.आई.आर .दर्ज करनी चाहिये केश-

 

Anmol Singh v. State of Uttar Pradesh

तथ्य-परिचय

  • यह निर्णय Allahabad High Court द्वारा दिया गया था (दिनांक 07.01.2021) जिसमें पक्ष ने § 156(3) CrPC के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी। LegitQuest

  • मूल रूप से वादी ने आवेदन किया था कि पुलिस एफआईआर दर्ज करे क्योंकि कथित कूच (entry), धमकी, आक्रमण आदि के आरोप थे। मजिस्ट्रेट ने आवेदन को शिकायत (complaint) के रूप में दर्ज किया, न कि एफआईआर तथा प्रत्यक्ष जांच का निर्देश दिया। वादी ने इसे चुनौती दी। LegitQuest

न्यायालय की व्याख्या

  • अदालत ने कहा कि § 156(3) CrPC के अंतर्गत जब मजिस्ट्रेट को सूचना (information) मिलती है कि किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) हुआ है, तो मजिस्ट्रेट के सामने विकल्प हैं —

    • आवेदन को खारिज करना;

    • पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच निर्देश देना;

    • आवेदन को शिकायत के रूप में रिकॉर्ड करना तथा § 202 के तहत आगे की प्रक्रिया अपनाना। Elegalix+1

  • मजिस्ट्रेट को अपने आदेश में न्याय-मंशा दिखानी चाहिए, यानी केवल ‘सुन लिया’ कह देना पर्याप्त नहीं है। यानि निर्णय मे “judicial mind” लागू होना चाहिए। Supreme Today+1

  • इस मामले में, आवेदन में तथ्य स्पष्ट थे कि आक्रमण हुआ था, इसलिए मजिस्ट्रेट को एफआईआर निर्देश देना चाहिए था। मजिस्ट्रेट ने यह नहीं किया, इसलिए आदेश में खामी पाई गई। Supreme Today

प्रमुख बिंदु

  • मजिस्ट्रेट का विवेक (discretion) है, किंतु वह मायावी नहीं होना चाहिए; वह रूढ-प्रवृत्ति (routine) से आदेश न दे।

  • यदि आवेदन में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का आशय हो, तो मजिस्ट्रेट को एफआईआर दर्ज कराने निर्देश देना चाहिए।

  • यह निर्णय यह बताता है कि मजिस्ट्रेट का § 156(3) या § 202 के तहत विकल्प है, पर निर्णय लेने में प्रक्रिया-दृष्टिकोण (procedure-based reasoning) आवश्यक है।

विश्लेषण एवं आपके लिए बातें

  • आपके मथुरा क्षेत्र में यदि ऐसी परिस्थिति हो जहाँ मजिस्ट्रेट § 156(3) के अंतर्गत मामला पूछ रहा है, तो इस निर्णय के आधार पर आप तर्क दे सकते हैं कि मजिस्ट्रेट ने विवेक पूर्ण रूप से प्रयोग किया है या नहीं।

  • यदि आदेश सिर्फ ‘शिकायत-केस’ में डालने का है जबकि तथ्य पहला संज्ञेय अपराध दिखाते हैं, तो पक्षकार इस निर्णय से चुनौती कर सकता है।

  • इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि मजिस्ट्रेट को स्वचालित रूप से एफआईआर निर्देश देना जरूरी नहीं है, पर यदि आवेदन योग्य हो, तो उसे निर्देश देना चाहिए और उसकी वजह बतानी चाहिए।


समग्र निष्कर्ष

  • ये तीन निर्णय अलग-अलग विधिक प्रश्नों को छूते हैं — सिविल वादों में प्लेटेंट कारण-ए-कार्रवाई एवं समयसीमा (Dahiben), आपराधिक जाँच में आवाज-नमूना लेने की वैधता (Ritesh Sinha), तथा मजिस्ट्रेट की विवेकी शक्तियों का उपयोग (§ 156(3), § 202 CrPC) (Anmol Singh)।

  • इनके माध्यम से वकील के रूप में आप निम्न बातें कर सकते हैं –

    • सिविल वाद की शुरुआत में ही प्रारंभिक छँटनी (screening) के लिए Order VII Rule 11 का उपयोग।

    • आपराधिक जाँच में तकनीकी साक्ष्यों (voice samples) को समझना और उन्हें चुनौती देना/अनुमोदित करना।

    • मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया-गत विवेक का सही उपयोग एवं आदेश की समीक्षा।

  •  

आरोपी (Appellant) से एक मोबाइल फोन पर रिकॉर्डेड संवाद की पहचान के लिए आवाज़ के नमूने (voice sample) लेने का आदेश केश--Ritesh Sinha v. State of Uttar Pradesh (2019)

 

2. Ritesh Sinha v. State of Uttar Pradesh (2019)

तथ्य-परिचय

  • इस मामले में आरोपी (Appellant) का नाम Ritesh Sinha था। एक मोबाइल फोन पर रिकॉर्डेड संवाद की पहचान के लिए आवाज़ के नमूने (voice sample) लेने का आदेश जज द्वारा दिया गया था। Drishti Judiciary+1

  • मुख्य मुद्दा था कि क्या न्यायालय (मजिस्ट्रेट) को उस व्यक्ति से आवाज़ का नमूना लेने का अधिकार है, विशेष रूप से जब उस व्यक्ति को अभियुक्त नहीं माना गया हो, और क्या यह प्रक्रिया संवैधानिक अधिकारों (विशेषकर Article 20(3) – आत्म स्वीकृती का अधिकार, तथा Article 21 – जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है। Alec+1

न्यायालय की व्याख्या

  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आवाज़ का नमूना लेने का आदेश आत्म-स्वीकृती (self-incrimination) वाले साक्ष्य (testimonial evidence) की श्रेणी में नहीं आता। NLU Website+1

  • अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वह जांच के प्रयोजन से किसी व्यक्ति से आवाज़ का नमूना ले सके, जब अन्य साक्ष्य (जैसे मोबाइल रिकॉर्ड) उसकी पहचान का समर्थन करते हों। Indian Kanoon+1

  • विशेष रूप से, क्योंकि संसद द्वारा इस विषय पर स्पष्ट प्रावधान नहीं बनाए गए थे, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया कि न्यायालय को इस शक्ति का प्रयोग न्यायसंगत उपाय (judicially controlled) के रूप में करना चाहिए। Law Finder Live+1

प्रमुख बिंदु

  • आदेश: “A Judicial Magistrate must be conceded the power to order a person to give a sample of his voice for the purpose of investigation of a crime.” Indian Kanoon+1

  • अदालत ने यह बताया कि इस तरह का नमूना अनुसंधान (forensic) उद्देश्य से लिया जाता है, और वह व्यक्तिगत बयान (testimonial) नहीं है, इसलिए Article 20(3) का दायरा नहीं बनता। gnlu.ac.in+1

  • हालांकि, यह भी कहा गया कि इस शक्ति का इस्तेमाल सतर्कता से, न्यायिक निगरानी के अंतर्गत किया जाना चाहिए।

विश्लेषण एवं आपके लिए बातें

  • आप आपराधिक लेन-देन में वकील के रूप में इस निर्णय का उपयोग कर सकते हैं जहाँ आवाज़ की पहचान, मोबाइल वार्तालाप, बायोमेट्रिक नमूने आदि की आवश्यकता हो।

  • यदि पक्षकार कहता है कि आवाज नमूना लेना संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है — तो आप इस निर्णय के आधार पर तर्क दे सकते हैं कि यह आदेश वैध है, बशर्ते प्रक्रिया शुद्ध हो और न्यायिक नियंत्रण हो।

Order VII Rule 11 CPC (a) पर केश सुप्रीम कोर्ट-1. Dahiben v. Arvindbhai Kalyanji Bhanusali (2020)

 

1. Dahiben v. Arvindbhai Kalyanji Bhanusali (2020)

तथ्य-परिचय

  • वादी (Plaintiffs) के नाम से संपत्ति थी, जो कि पुराने आरक्षण (restrictive tenure) के अंतर्गत थी, अर्थात् Section 73AA of the Gujarat Land Revenue Code की व्यवस्था के अंतर्गत थी। Sci API+2Indian Kanoon+2

  • वादी ने 13.05.2008 को बिक्री की अनुमति के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन किया था, जिसे 19.06.2009 को अनुमति मिली थी। Sci API+1

  • 02.07.2009 को एक पंजीकृत बिक्री-विलेख (Sale Deed) वादी द्वारा प्रतिवादी 1 के नाम कराई गई। Indian Kanoon+1

  • वादी का दावा था कि उन्हें पूरी बिक्री कीमत नहीं मिली, और इसलिए वे इस बिक्री विलेख को रद्द कराना चाहते थे। Indian Kanoon

  • प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि वादी ने विलेख के समय स्वीकार किया था कि उन्हें पूरी राशि मिल चुकी है, बैंकिंग अस्वीकृतियों, रिटायर्ड चेक आदि प्रस्तुत नहीं किये। Indian Kanoon+1

  • मुकदमा 15.12.2014 को दाखिल किया गया था, अर्थात् विलेख के लगभग 5 वर्ष बाद। Indian Kanoon

न्यायालय की व्याख्या

  • Limitation Act, 1963 के अंतर्गत तय किया कि वादी को यह मामला 3 वर्ष के भीतर दाखिल करना चाहिए था (Articles 58/59) क्योंकि बिक्री विलेख 02.07.2009 को हुआ था। Indian Kanoon+1

  • वादी ने विलेख की पंजीकरण के समय यह स्वीकार किया था कि उन्हें राशि मिल चुकी है — इस तथ्य को उन्होंने बाद में चुनौती दी थी, पर उससे भी समयसीमा पार हो चुकी थी। Sci API+1

  • न्यायालय ने पाया कि वादी ने विलेख के बाद करीब 5 वर्ष तक किसी भी शिकायत, बैंक स्टेटमेंट, चेक रिटर्न आदि का संचय नहीं किया था और बाद में अचानक दावा किया था — इस पर भरोसा नहीं किया गया। Indian Kanoon

  • सुप्रीम कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि जब plaint (वादपत्र) पढ़ने मात्र से स्पष्ट हो जाता है कि वाद समय-सीमा (limitation) कारण अवं स्थापित नहीं हो सकता, या कि व्यवस्था के अंतर्गत कारण-ए-कार्रवाई (cause of action) नहीं बना है, तो अदालत द्वारा वादपत्र को प्रारंभ में ही खारिज किया जाना चाहिए। Pahuja Law Academy+2ALG India Law Offices LLP+2

  • इसी क्रम में, अदालत ने कहा कि यद्यपि वादी ने दावा किया कि राशि नहीं मिली, परंतु विलेख में स्पष्ट था कि स्वीकार किया गया था कि राशि मिल चुकी है; अतः वादी का केस खुद ही कमजोर था। Sci API+1

प्रमुख निर्देश बहुत

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि Code of Civil Procedure, 1908 के Order VII Rule 11 CPC (a) तथा (d) उपधाराओं के अंतर्गत प्लांट को खारिज करना उचित है जहाँ-

    • (a) plaint में कारण-ए-कार्रवाई (cause of action) नहीं प्रकट हो रहा हो। ALG India Law Offices LLP+1

    • (d) plaint के आवेदनों से स्पष्ट हो कि वाद किसी कानून द्वारा रोकित (barred by law) है — जैसे कि समयसीमा बीत गई है। Drishti Judiciary+1

  • अदालत ने कहा कि इस तरह के आवेदन (Order VII Rule 11) को वाद के प्रविष्टि स्तर पर ही करना चाहिए ताकि समय और संसाधनों की बचत हो सके। Bhatt & Joshi Associates+1

  • अदालत ने यह भी गाइड किया कि इस निर्णय में plaint के केवल तथ्यों (averments) पर ही विचार किया जाए — अतिरिक्त साक्ष्य, विस्तृत पूछताछ, परीक्षण नहीं। en.lawarticle.in+1

विश्लेषण एवं आपके लिए बातें

आपके द्वारा प्रस्तुत वकीली कार्य (मथुरा क्षेत्र) के संदर्भ में, इस निर्णय के महत्व को निम्न रूप से समझा जा सकता है:

  • यदि आपकी स्क्रिप्ट में कोई ऐसा वाद है जो समय-सीमा (limitation) की बाधा में है, या जिसमें plaint में स्पष्ट कारण-ए-कार्रवाई नहीं दिख रहा, तो आप समय से पहले Order VII Rule 11 (a) / (d) का आवेदन तैयार कर सकते हैं।

  • खासतौर पर खण्ड “बार्ड बाई लॉ” (barred by law) की स्थिति में यह निर्णय उपयोगी है — जैसे कि बिक्री विलेख, भूमि विवाद, पुराने वाद आदि में।

  • प्लांट की समीक्षा करते समय ध्यान दें: क्या कारण-ए-कार्रवाई स्पष्ट लिखा है, क्या समयसीमा बीत चुकी है, क्या वाद पत्र में वह तथ्य दिखाई दे रहे हैं जो अदालत को पहले ही खारिज करने योग्य बनाते हैं।

एफ.आई.आर निरस्त की गयी सुप्रीम कोर्ट द्वारा केश - राजेन्द्र बिहारी लाल एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य 2025

 

🏛️ भाग A – तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (Factual Matrix)

राजेन्द्र बिहारी लाल एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
(रिट याचिका (फौ.) संख्या 123/2023 एवं सम्बद्ध आपराधिक अपीलें)


1. पृष्ठभूमि

इस मामले में याचिकाकर्ता (राजेन्द्र बिहारी लाल और अन्य) ने कई एफ.आई.आर. को निरस्त (quash) करने की मांग की है।
इन एफ.आई.आर. को भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं और उत्तर प्रदेश धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 (U.P. Conversion Act) के तहत दर्ज किया गया था।

कुल मिलाकर छह एफ.आई.आर. थीं — जिनका सार नीचे है:

क्रमांकएफ.आई.आर. संख्यातिथिथाना / जिलाधाराएँ
1224/202215.04.2022कोतवाली, फतेहपुरIPC 153A, 506, 420, 467, 468 व U.P. Conversion Act की धारा 3 व 5(1)
247/202320.01.2023कोतवाली, फतेहपुरIPC 120B व Conversion Act की धारा 3/5(1)
354/202323.01.2023कोतवाली, फतेहपुरIPC 420, 467, 468, 506, 120B व Conversion Act 3/5(1)
455/202323.01.2023कोतवाली, फतेहपुरवही उपरोक्त धाराएँ
560/202324.01.2023कोतवाली, फतेहपुरवही उपरोक्त धाराएँ
6538/202311.12.2023नवाबगंज, प्रयागराजIPC 307, 386, 504 व Conversion Act 3/5(1)

2. विवाद का केंद्र

मूल विवाद यह है कि क्या उपरोक्त एफ.आई.आर. — जो “धर्मांतरण” से संबंधित हैं —
वैध हैं या नहीं?
याचिकाकर्ता चाहते हैं कि इन सभी एफ.आई.आर. को निरस्त कर दिया जाए क्योंकि

  • या तो एक ही घटना पर कई एफ.आई.आर. दर्ज की गईं,

  • या वे कानूनी रूप से अयोग्य व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गईं,

  • या उनमें अपराध का कोई ठोस आधार नहीं है।


3. एफ.आई.आर. 224/2022 – पहली रिपोर्ट

यह एफ.आई.आर. 15 अप्रैल 2022 को विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष हिमांशु दीक्षित की शिकायत पर दर्ज हुई।
उनका आरोप था कि “Evangelical Church of India”, हरिहरगंज, फतेहपुर में
14 अप्रैल 2022 को “मंडी थर्सडे” के दिन लगभग 90 हिन्दू लोगों का ईसाई धर्म में जबरन धर्मांतरण किया जा रहा था।

उन्होंने कहा कि जब उन्होंने व उनके संगठन के सदस्य वहां पहुँचकर सूचना दी,
तो चर्च के “Father Vijay Masih” ने यह स्वीकार किया कि पिछले 34 दिनों से
लोगों को बहला-फुसलाकर और उनके दस्तावेज़ों में नाम बदलवाकर ईसाई बनाया जा रहा है।

इस रिपोर्ट में 35 नामित और लगभग 20 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया।

महत्त्वपूर्ण तथ्य:
हिमांशु दीक्षित स्वयं धर्मांतरण के शिकार नहीं थे;
वे सूचना देने वाले व्यक्ति थे (एक तरह से “whistleblower”)।
यह तथ्य बाद में कानूनी दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण बनता है।


4. एफ.आई.आर. 47/2023 – व्यक्तिगत धर्मांतरण का आरोप

20 जनवरी 2023 को सर्वेन्द्र विक्रम सिंह नामक व्यक्ति ने यह रिपोर्ट दर्ज कराई।
उन्होंने कहा कि उन्हें फतेहपुर में काम के दौरान
रामचंद्र नामक व्यक्ति ने ईसाई बनने का लालच दिया —
नकद धन, नौकरी, और विवाह का प्रस्ताव दिया गया।
बाद में उन्हें प्रयागराज के SHUATS विश्वविद्यालय में
कुछ व्यक्तियों (जिनमें वाइस-चांसलर R.B. Lal शामिल थे) से मिलवाया गया।
उन्होंने कथित रूप से 25 दिसंबर 2021 को “Presbyterian Church, देविगंज” में धर्म बदल लिया।
बाद में पछतावे के बाद उन्होंने फिर से हिन्दू धर्म अपना लिया।


5. एफ.आई.आर. 54/2023 – सामूहिक धर्मांतरण

23 जनवरी 2023 को वीरेंद्र कुमार ने यह रिपोर्ट दी कि
उन्हें और लगभग 90 अन्य हिन्दू लोगों को
14 अप्रैल 2022 को हरिहरगंज चर्च में ईसाई बनाने के लिए लालच और धमकी दी गई।
उनका कहना था कि उनका आधार कार्ड लेकर नाम बदल दिया गया —
“वीरेंद्र डी'सूज़ा” कर दिया गया —
और धमकी दी गई कि यदि हिन्दू धर्म में लौटे तो “यीशु भगवान नाराज़ होकर सज़ा देंगे”।


6. एफ.आई.आर. 55/2023

सिर्फ सात मिनट बाद, एक और रिपोर्ट संजय सिंह नामक व्यक्ति ने
उसी थाने में, उसी घटना पर दर्ज कराई।
शिकायत की भाषा लगभग समान थी —
बस नाम और व्यक्तिगत विवरण अलग थे।
उनका नया नाम “संजय अल्बर्ट फ्रांसिस” बताकर आधार कार्ड बदला गया था।


7. एफ.आई.आर. 60/2023

24 जनवरी 2023 को सत्यपाल नामक व्यक्ति ने वही आरोप लगाए —
इसी चर्च, वही तारीख़, वही घटनाक्रम, वही प्रकार का कथित धर्मांतरण।


8. एफ.आई.आर. 538/2023

यह रिपोर्ट 11 दिसंबर 2023 को नवाबगंज, प्रयागराज थाने में दर्ज हुई।
इसमें एक नए आरोपकर्ता संजीव कुमार ने कहा कि
आरोपियों ने उसे गोली मारने की कोशिश की, ₹1 लाख मांगे,
और वह व्यक्ति भी अवैध धर्मांतरण करवाने में लिप्त है।


9. घटनाओं का सारांश

कुल मिलाकर, तीन अलग-अलग घटनाएँ सामने आईं —
1️⃣ 14.04.2022 – फतेहपुर चर्च में कथित सामूहिक धर्मांतरण (एफ.आई.आर. 224/2022, 54/2023, 55/2023, 60/2023)
2️⃣ 25.12.2021 – व्यक्तिगत धर्मांतरण (एफ.आई.आर. 47/2023)
3️⃣ 10.12.2023 – प्रयागराज घटना (एफ.आई.आर. 538/2023)


10. जांच की स्थिति

सभी एफ.आई.आर. में अब तक जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दायर की जा चुकी है।
फिर भी याचिकाकर्ता चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इन एफ.आई.आर. और उनके आधार पर चली सारी कार्यवाही को निरस्त करे।


🏛️ भाग B – उच्च न्यायालय के आदेश (Impugned Judgments)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of U.P. & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ पृष्ठभूमि

उपरोक्त सभी एफ.आई.आर. के खिलाफ अलग-अलग याचिकाएँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर की गई थीं,
जिनमें मांग की गई थी कि

“इन एफ.आई.आर. को रद्द किया जाए क्योंकि ये एक ही घटना से संबंधित हैं या इनका कोई कानूनी आधार नहीं है।”

हालाँकि, उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाएँ खारिज कर दीं,
और यही आदेश सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए गए।

नीचे हर आदेश का सारांश दिया गया है 👇


2️⃣ 2 जून 2023 का साझा आदेश

तीन अपीलें — SLP (Cr.) Nos. 7380/2023, 13679/2023, और 7233/2023 —
इसी एक साझा आदेश से जुड़ी हैं।

हाईकोर्ट की प्रमुख बातें:

  • याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ये एफ.आई.आर. बहुत देरी से दर्ज की गई हैं (एक साल बाद)।

  • पहले से एफ.आई.आर. 224/2022 दर्ज थी, इसलिए बाद की एफ.आई.आर. (54, 55, 60)
    “एक ही घटना” पर “दूसरी एफ.आई.आर.” हैं — जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय
    T.T. Antony vs State of Kerala (2001) 6 SCC 181 के अनुसार अमान्य है।

  • लेकिन राज्य सरकार ने कहा कि पहले भी ऐसे ही मामले में एक समन्वय पीठ (Coordinate Bench)
    ने इसी प्रकार की याचिका खारिज की थी।

हाईकोर्ट का निष्कर्ष:

“एफ.आई.आर. 224/2022 को एक ऐसे व्यक्ति ने दर्ज कराया जो धर्मांतरण का शिकार नहीं था,
इसलिए वह ‘अनधिकृत व्यक्ति’ था।
अतः बाद की एफ.आई.आर. (54, 55, 60) पहली वैध रिपोर्ट मानी जाएंगी,
न कि दूसरी एफ.आई.आर.।”

इस आधार पर याचिकाएँ खारिज कर दी गईं।


3️⃣ 5 जुलाई 2023 का आदेश

यह आदेश SLP (Cr.) No. 10187/2023 से संबंधित है (एफ.आई.आर. 60/2023)।
हाईकोर्ट ने कहा कि —
पहले से ही इसी एफ.आई.आर. पर एक अन्य याचिका खारिज की जा चुकी है,
इसलिए “नई याचिका” में विचार का कोई औचित्य नहीं है।


4️⃣ 4 अगस्त 2023 का आदेश

SLP (Cr.) No. 13231/2023 — एफ.आई.आर. 54/2023 से संबंधित था।

हाईकोर्ट ने कहा:

  • यह तर्क कि यह “दूसरी एफ.आई.आर.” है, पहले ही नकारा जा चुका है।

  • एफ.आई.आर. में अपराध के “संज्ञेय तत्व (Cognizable Offence)” हैं,
    इसलिए इसे निरस्त नहीं किया जा सकता।


5️⃣ 28 अगस्त 2023 का आदेश

SLP (Cr.) Nos. 15251–15254/2023 (एफ.आई.आर. 60/2023 से जुड़ी याचिकाएँ)।
हाईकोर्ट ने कहा कि —

“अभियोग में गंभीर आरोप हैं; अपराध स्पष्ट रूप से संज्ञेय है;
इसलिए एफ.आई.आर. रद्द करने का कोई आधार नहीं है।”

साथ ही यह भी कहा गया कि

“कुछ अन्य सह-आरोपियों की याचिकाएँ पहले ही खारिज हो चुकी हैं,
इसलिए यह भी खारिज की जाती है।”


6️⃣ 17 फरवरी 2023 का आदेश (एफ.आई.आर. 54/2023)

यह आदेश सबसे महत्वपूर्ण है — (SLP (Cr.) No. 3818/2023)।

यहाँ हाईकोर्ट ने सीधे T.T. Antony बनाम केरल राज्य (2001) के सिद्धांत पर विचार किया।

मुख्य विचार:

  • एफ.आई.आर. 224/2022 और 54/2023 एक ही घटना (14.04.2022) से संबंधित हैं।

  • यदि केवल इस आधार पर देखें, तो यह “दूसरी एफ.आई.आर.” होती —
    लेकिन U.P. Conversion Act की धारा 4 यह निर्धारित करती है
    कि शिकायत केवल “पीड़ित व्यक्ति या उसके रिश्तेदार” ही दर्ज करा सकते हैं।

  • चूँकि एफ.आई.आर. 224/2022 विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी ने दर्ज कराई थी,
    वह “पीड़ित” नहीं था — इसलिए यह अमान्य एफ.आई.आर. मानी गई।

इसलिए निष्कर्ष:

“एफ.आई.आर. 54/2023 ही वास्तविक वैध एफ.आई.आर. है;
यह ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ नहीं बल्कि पहली सही एफ.आई.आर.’ मानी जाएगी।”

हाईकोर्ट ने कहा —
एफ.आई.आर. में अपराध के तत्व मौजूद हैं,
इसलिए इसे रद्द नहीं किया जा सकता।


7️⃣ 17 फरवरी 2023 का एक अन्य आदेश

(SLP (Cr.) No. 10555/2024 — एफ.आई.आर. 55/2023)
यहाँ आरोपी एक संगीत शिक्षक था।
उसने कहा कि वह केवल कार्यक्रम में गाना बजा रहा था,
धर्मांतरण से कोई संबंध नहीं था।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा —

“एफ.आई.आर. में गंभीर सामाजिक प्रभाव वाले आरोप हैं;
इसलिए गहराई से जांच जरूरी है,
और संभवतः ‘कस्टोडियल इंटरोगेशन’ की भी आवश्यकता हो सकती है।”
याचिका खारिज।


8️⃣ 29 अप्रैल 2024 का आदेश (एफ.आई.आर. 538/2023)

(SLP (Cr.) No. 8615/2024)
यह प्रयागराज की घटना से संबंधित था।
हाईकोर्ट ने कहा —

“एफ.आई.आर. के साधारण अध्ययन से ही यह प्रतीत होता है
कि आरोप प्रथमदृष्टया सही हैं।”
इसलिए धारा 482 CrPC के तहत पूरी कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया।


🔹 सारांश (High Court Findings Summary)

एफ.आई.आर.हाईकोर्ट का दृष्टिकोणपरिणाम
224/2022अमान्य (पीड़ित द्वारा दर्ज नहीं)कोई राहत नहीं
54, 55, 60/2023वैध; अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता हैयाचिका खारिज
47/2023वैध; शिकायतकर्ता स्वयं धर्मांतरित व्यक्तियाचिका खारिज
538/2023प्रयागराज का मामला; साक्ष्य पर्याप्तयाचिका खारिज

🏛️ भाग C – याचिकाकर्ताओं के तर्क (Submissions on behalf of Petitioners)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं —
श्री मुकुल रोहतगी, श्री सिद्धार्थ लूथरा और श्री आनंद ग्रोवर ने पक्ष रखा।

उन्होंने न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट रूप से कहा कि
इन सभी एफ.आई.आर. का उद्देश्य न्याय नहीं बल्कि उत्पीड़न है।


2️⃣ पहला प्रमुख तर्क — “एक ही घटना पर अनेक एफ.आई.आर. अमान्य हैं”

  • सभी एफ.आई.आर. (224/2022, 54/2023, 55/2023, 60/2023)
    एक ही घटना — 14 अप्रैल 2022 को हरिहरगंज, फतेहपुर के Evangelical Church of India — से संबंधित हैं।

  • केवल शिकायतकर्ता अलग-अलग हैं, घटना एक ही है।

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्णय T.T. Antony vs State of Kerala (2001) 6 SCC 181 के अनुसार,
    “एक ही घटना पर दूसरी एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की जा सकती।”

इसलिए — बाद की सभी एफ.आई.आर. स्वतः अमान्य हैं।

उन्होंने कहा कि यदि हर व्यक्ति जिसे घटना के बारे में पता है,
अलग-अलग एफ.आई.आर. दर्ज कराने लगे,
तो यह कानून के सिद्धांतों का दुरुपयोग होगा।


3️⃣ दूसरा प्रमुख तर्क — “पहली एफ.आई.आर. वैध थी”

  • हाईकोर्ट ने यह मान लिया कि एफ.आई.आर. 224/2022 अवैध है क्योंकि
    वह “पीड़ित व्यक्ति” द्वारा नहीं बल्कि VHP के सदस्य द्वारा दर्ज की गई थी।

  • लेकिन धारा 154 CrPC में कहीं नहीं लिखा है कि
    केवल “पीड़ित व्यक्ति” ही रिपोर्ट दर्ज करा सकता है।
    कोई भी व्यक्ति, जिसे अपराध की जानकारी है, एफ.आई.आर. दर्ज करा सकता है।

  • इसलिए 224/2022 ही पहली वैध एफ.आई.आर. थी,
    और उसके बाद की सभी रिपोर्टें “दूसरी एफ.आई.आर.” मानी जाएंगी,
    जिन्हें निरस्त किया जाना चाहिए।


4️⃣ तीसरा तर्क — “U.P. Conversion Act की धारा 4 का गलत प्रयोग”

  • हाईकोर्ट ने कहा कि U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1) के अनुसार
    शिकायत केवल “पीड़ित व्यक्ति, उसके माता-पिता, भाई-बहन, या कानूनी अभिभावक” ही कर सकते हैं।

  • परंतु याचिकाकर्ताओं ने बताया कि इस धारा का उद्देश्य “व्यक्तिगत धर्मांतरण” पर नियंत्रण है,
    न कि “सामूहिक घटनाओं” पर।

  • यदि किसी जगह सामूहिक धर्मांतरण चल रहा हो,
    तो कोई भी नागरिक (whistleblower) पुलिस को सूचना दे सकता है।

  • अतः एफ.आई.आर. 224/2022 वैध है;
    हाईकोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की।


5️⃣ चौथा तर्क — “कई एफ.आई.आर. केवल राजनीतिक दबाव से दर्ज हुईं”

  • याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि
    राजनीतिक प्रभाव और मीडिया दबाव के कारण बार-बार नई एफ.आई.आर. दर्ज की गईं।

  • चार एफ.आई.आर. एक ही घटना पर अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा
    केवल कुछ मिनटों या घंटों के अंतर पर दर्ज की गईं।

  • इस तरह की पुनरावृत्ति कानून के अनुचित प्रयोग (Abuse of Process of Law) के समान है।


6️⃣ पाँचवाँ तर्क — “कानूनी दृष्टि से अपराध का गठन नहीं होता”

  • सभी एफ.आई.आर. में केवल “आरोप” हैं,
    कोई ठोस साक्ष्य नहीं कि किसी व्यक्ति ने वास्तव में जबरन धर्म बदला हो।

  • किसी भी एफ.आई.आर. में यह नहीं बताया गया कि
    किसी व्यक्ति ने शपथपूर्वक कहा कि उसे धमकाया गया, लुभाया गया, या दबाव डाला गया।

  • केवल सामान्य कथन हैं —
    जैसे “लालच दिया गया”, “नाम बदल दिया गया”, आदि —
    जो किसी दंडनीय अपराध का ठोस आधार नहीं हैं।


7️⃣ छठा तर्क — “शैक्षणिक संस्था पर बेबुनियाद आरोप”

  • मुख्य आरोपी राजेन्द्र बिहारी लाल, Sam Higginbottom University of Agriculture, Technology & Sciences (SHUATS) के वाइस-चांसलर हैं।

  • उनका काम धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन चलाना है।

  • याचिकाकर्ता का कहना था कि विश्वविद्यालय के अंदर धार्मिक संगठन या मिशन स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं,
    और प्रशासन का उनसे कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।


8️⃣ सातवाँ तर्क — “चार्जशीट दाख़िल होने से एफ.आई.आर. वैध नहीं हो जाती”

राज्य सरकार ने यह कहा कि चूँकि चार्जशीट दाख़िल हो चुकी है,
अब एफ.आई.आर. को रद्द नहीं किया जा सकता।
परंतु याचिकाकर्ताओं ने कहा —

“चार्जशीट केवल पुलिस की राय होती है;
यदि एफ.आई.आर. ही गैरकानूनी है,
तो उसके आधार पर बनी चार्जशीट भी टिक नहीं सकती।”

इसलिए सुप्रीम कोर्ट को पूरे अभियोजन को निरस्त करना चाहिए।


9️⃣ आठवाँ तर्क — “धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन”

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार करने की स्वतंत्रता देता है।

  • यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी अन्य धर्म को स्वीकार करता है,
    तो उसे “जबरन धर्मांतरण” नहीं कहा जा सकता।

  • राज्य सरकार ने “धर्मांतरण” को अपराध बनाकर संविधान की भावना का उल्लंघन किया है।


🔹 निष्कर्ष (याचिकाकर्ताओं की ओर से)

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि —
1️⃣ सभी एफ.आई.आर. एक ही घटना से जुड़ी हैं, अतः दूसरी एफ.आई.आर. अमान्य हैं।
2️⃣ पहली एफ.आई.आर. 224/2022 वैध थी; उसे अनदेखा करना कानून के विपरीत है।
3️⃣ आरोप अस्पष्ट हैं, साक्ष्य नहीं हैं, और यह सब राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है।
4️⃣ अतः सुप्रीम कोर्ट को इन सभी एफ.आई.आर. व संबंधित कार्यवाही को धारा 482 CrPC के तहत निरस्त करना चाहिए।


🏛️ भाग D – राज्य सरकार के तर्क (Submissions on behalf of the State of U.P.)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ अधिवक्ता की प्रस्तुति

उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से महाधिवक्ता (Advocate General) श्री अजय कुमार मिश्रा एवं अपर महाधिवक्ता श्री विनीत कुमार शुक्ला ने पक्ष रखा।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा कि —

“यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति के अधिकारों का नहीं, बल्कि सामाजिक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था का है।”

राज्य का तर्क था कि —

“धर्मांतरण के नाम पर ठगी, झूठे वादे और सामाजिक असंतुलन पैदा किया गया।
इसलिए कानून का कठोर रूप से प्रयोग आवश्यक था।”


2️⃣ पहला तर्क — “एफ.आई.आर. वैध और स्वतंत्र हैं”

राज्य ने कहा कि —

  • सभी एफ.आई.आर. में अलग-अलग पीड़ित व्यक्ति हैं,
    जिन्होंने अपने-अपने अनुभव के आधार पर शिकायतें दीं।

  • यदि एक ही स्थान पर अलग-अलग लोगों के साथ अपराध हुआ,
    तो प्रत्येक व्यक्ति की रिपोर्ट “अलग अपराध” के रूप में दर्ज की जा सकती है।

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Upkar Singh vs Ved Prakash (2004) 13 SCC 292 में कहा गया है कि
    यदि “अलग-अलग पीड़ित” हों, तो “दूसरी एफ.आई.आर.” भी मान्य होगी।

इसलिए सभी एफ.आई.आर. वैध हैं।


3️⃣ दूसरा तर्क — “पहली एफ.आई.आर. (224/2022) कानूनन अमान्य थी”

  • U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1) कहती है कि
    शिकायत केवल “पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार/अभिभावक” ही दर्ज करा सकते हैं।

  • एफ.आई.आर. 224/2022 VHP पदाधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई थी,
    जो घटना का प्रत्यक्ष शिकार नहीं था।

  • अतः यह एफ.आई.आर. कानूनी रूप से निरर्थक (non est) थी।

राज्य का कहना था कि —

“यदि पहली रिपोर्ट अवैध थी,
तो बाद में दर्ज हुई एफ.आई.आर. को ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ नहीं कहा जा सकता।
वे वास्तविक पहली रिपोर्ट हैं।”


4️⃣ तीसरा तर्क — “पीड़ितों ने स्वयं आरोप लगाए हैं”

  • एफ.आई.आर. 54/2023, 55/2023 और 60/2023 में
    शिकायतकर्ताओं ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें
    धर्म बदलने के लिए लालच, डर, और झूठे वादे दिए गए।

  • कुछ मामलों में उन्होंने यह भी कहा कि
    उनके आधार कार्ड पर नाम बदले गए,
    जिससे उनकी पहचान बदल दी गई।

  • यह सभी कार्य U.P. Conversion Act की धारा 3 और 5(1) के तहत
    “जबरन धर्मांतरण” की श्रेणी में आते हैं।


5️⃣ चौथा तर्क — “राज्य का कर्तव्य है समाज की रक्षा करना”

राज्य ने जोर दिया कि —

“धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि कोई संगठन
गरीब, अशिक्षित या कमजोर वर्ग के लोगों को
पैसे, नौकरी या चिकित्सा की लालच देकर धर्म बदलने पर मजबूर करे।”

  • संविधान का अनुच्छेद 25 “धार्मिक स्वतंत्रता” देता है,
    लेकिन यह अधिकार “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन है।

  • यदि धर्मांतरण के कारण सामाजिक तनाव और हिंसा की संभावना हो,
    तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।


6️⃣ पाँचवाँ तर्क — “पुलिस जांच निष्पक्ष रही है”

राज्य ने बताया कि —

  • प्रत्येक एफ.आई.आर. की जांच स्वतंत्र पुलिस अधिकारियों ने की।

  • पुलिस ने बयान दर्ज किए, दस्तावेज़ एकत्र किए,
    और चार्जशीट दाख़िल की, जिन्हें अब अदालत ने संज्ञान में लिया है।

  • याचिकाकर्ताओं को चार्जशीट पर विचारणीय अदालत में अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

इसलिए इस स्तर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा एफ.आई.आर. निरस्त करना उचित नहीं है।


7️⃣ छठा तर्क — “धारा 482 CrPC का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए”

राज्य ने कहा कि —

“धारा 482 का उद्देश्य न्यायालय की प्रक्रिया को सुरक्षित रखना है,
न कि हर जांच या अभियोजन को रोकना।”

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार (जैसे State of Haryana v. Bhajan Lal, 1992 Supp (1) SCC 335)
यह कहा है कि जब संज्ञेय अपराध के तत्व दिखाई देते हैं,
तो न्यायालय को एफ.आई.आर. रद्द करने से बचना चाहिए।

यह मामला भी “प्रथम दृष्टया” अपराध दर्शाता है।


8️⃣ सातवाँ तर्क — “याचिकाकर्ता प्रभावशाली व्यक्ति हैं”

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि —

  • याचिकाकर्ता विश्वविद्यालय के उच्च पदों पर हैं,
    और वे स्वयं को “धर्मिक प्रचार” से अलग दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

  • परंतु जांच में ऐसे दस्तावेज़ और गवाह मिले हैं
    जो दिखाते हैं कि विश्वविद्यालय परिसर और चर्च गतिविधियाँ
    एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ी थीं।

  • इसलिए यह कहना कि “वे केवल शैक्षणिक कार्य करते हैं” गलत है।


9️⃣ आठवाँ तर्क — “धर्मांतरण का प्रभाव समाज पर गहरा है”

राज्य ने सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाया कि —

“धर्मांतरण के ऐसे मामले केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन का कारण बनते हैं।”
“यदि इसे बिना रोक-टोक चलने दिया जाए,
तो इससे सांप्रदायिक तनाव और हिंसा फैल सकती है।”

इसलिए कानून का उद्देश्य ‘धर्म पर रोक’ नहीं बल्कि ‘धोखे या दबाव से होने वाले धर्मांतरण पर रोक’ है।


🔹 राज्य का निष्कर्ष

1️⃣ पहली एफ.आई.आर. 224/2022 कानूनन अमान्य थी।
2️⃣ बाद की एफ.आई.आर. अलग-अलग पीड़ितों द्वारा दर्ज वैध शिकायतें हैं।
3️⃣ पुलिस जांच निष्पक्ष व प्रमाणिक है; चार्जशीट दायर हो चुकी है।
4️⃣ धारा 482 CrPC के तहत एफ.आई.आर. निरस्त करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
5️⃣ यह मामला “जनहित” और “सामाजिक व्यवस्था” से जुड़ा है — इसलिए न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।


🏛️ भाग E – सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचारणीय प्रश्न (Issues for Consideration)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ प्रस्तावना

दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद,
सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि यह मामला केवल एक व्यक्ति या संस्था का नहीं,
बल्कि इसमें संविधानिक स्वतंत्रता (Freedom of Religion),
फौजदारी प्रक्रिया (Criminal Law Principles) और
सामाजिक व्यवस्था (Public Order)
तीनों के बीच संतुलन का प्रश्न शामिल है।


2️⃣ मुख्य प्रश्न

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में निम्नलिखित प्रमुख प्रश्न तय किए जाने आवश्यक हैं 👇


प्रश्न 1:

क्या जब एक ही घटना से संबंधित अपराध पर एक एफ.आई.आर. पहले से दर्ज हो चुकी हो,
तो उसी घटना के बारे में अन्य व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गई एफ.आई.आर.
“दूसरी एफ.आई.आर.” मानी जाएगी और इसलिए अवैध होगी?


प्रश्न 2:

क्या U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1)
इस बात को पूरी तरह सीमित करती है कि शिकायत केवल
“पीड़ित व्यक्ति या उसके रिश्तेदार” ही दर्ज करा सकते हैं —
या क्या कोई “साधारण नागरिक” भी, यदि वह किसी अपराध को देखे,
एफ.आई.आर. दर्ज करा सकता है?


प्रश्न 3:

क्या एफ.आई.आर. 224/2022 (जो विश्व हिन्दू परिषद पदाधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई थी)
को “वैध प्रथम रिपोर्ट” माना जा सकता है?
यदि हाँ, तो क्या उसके बाद दर्ज की गई एफ.आई.आर.
“दूसरी एफ.आई.आर.” के रूप में निरस्त हो जाएंगी?


प्रश्न 4:

क्या इस मामले में आरोपों की प्रकृति इतनी गंभीर है कि
सुप्रीम कोर्ट को धारा 482 CrPC के तहत हस्तक्षेप से बचना चाहिए?
या फिर यह मामला ऐसा है जहाँ न्यायालय को “न्याय की रक्षा” के लिए
एफ.आई.आर. रद्द करनी चाहिए?


प्रश्न 5:

क्या धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25)
“स्वैच्छिक धर्मांतरण” को भी संरक्षण देती है,
या राज्य को यह अधिकार है कि वह “जबरन / प्रलोभन से किए गए धर्मांतरण” पर
कानूनी रोक लगाए?


3️⃣ सहायक प्रश्न

इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि निम्न मुद्दों पर स्पष्टता आवश्यक है —

  • क्या पुलिस को अधिकार है कि वह कई शिकायतों को मिलाकर
    एक ही जांच (Consolidated Investigation) करे?

  • क्या आरोपपत्र (Charge Sheet) दाख़िल हो जाने के बाद
    एफ.आई.आर. को निरस्त करने की मांग की जा सकती है?

  • क्या संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत
    “धार्मिक प्रचार” और “धर्मांतरण” के बीच कोई वैधानिक अंतर है?


4️⃣ न्यायालय का दृष्टिकोण

न्यायालय ने कहा —

“इन प्रश्नों का समाधान केवल तकनीकी रूप से नहीं किया जा सकता।
यहाँ यह देखना आवश्यक है कि क्या दर्ज हुई एफ.आई.आर.
वास्तव में एक ही ‘लेन-देन’ (transaction) से जुड़ी हैं
या वे अलग-अलग अपराधों की श्रेणी में आती हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि —

“धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था
दोनों ही संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त मूल्य (constitutional values) हैं;
इसलिए निर्णय इन दोनों के बीच उचित संतुलन पर आधारित होगा।”


🔹 सारांश (Issues Recap)

क्रमविचारणीय प्रश्नविषय
1दूसरी एफ.आई.आर. का वैधानिकता प्रश्नएक ही घटना पर कई रिपोर्टें
2धारा 4(1) U.P. Conversion Act की व्याख्याशिकायत दर्ज करने का अधिकार
3पहली एफ.आई.आर. की वैधताक्या 224/2022 असली रिपोर्ट थी
4धारा 482 CrPC के तहत हस्तक्षेपएफ.आई.आर. रद्द करने का अधिकार
5धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक व्यवस्थासंविधानिक संतुलन

🏛️ भाग F – सुप्रीम कोर्ट का विधिक विश्लेषण (Court’s Legal Analysis and Reasoning)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


🔹 1️⃣ प्रारंभिक टिप्पणी

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संजय कुमार की खंडपीठ ने यह कहा —

“यह मामला केवल तकनीकी या प्रक्रिया संबंधी विवाद नहीं है;
यह संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और
राज्य द्वारा सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के अधिकार –
इन दोनों के संतुलन का प्रश्न है।”


🔹 2️⃣ “दूसरी एफ.आई.आर.” का सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने पहले यह देखा कि याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था —
‘एक ही घटना पर दूसरी एफ.आई.आर. अवैध है’।

इसके लिए उन्होंने निम्न निर्णयों का उल्लेख किया 👇

  1. T.T. Antony v. State of Kerala (2001) 6 SCC 181

  2. Upkar Singh v. Ved Prakash (2004) 13 SCC 292

  3. Babubhai v. State of Gujarat (2010) 12 SCC 254


⚖️ न्यायालय की व्याख्या

  • T.T. Antony में कहा गया था कि यदि “एक ही लेन-देन” (same transaction) पर
    एक से अधिक एफ.आई.आर. दर्ज की जाएँ,
    तो दूसरी एफ.आई.आर. अवैध होगी।

  • परंतु Upkar Singh के निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि
    यदि नई एफ.आई.आर. अलग अपराध या अलग पीड़ित व्यक्ति से संबंधित हो,
    तो वह वैध मानी जाएगी।

“इसलिए, यह देखना आवश्यक है कि क्या सभी एफ.आई.आर.
एक ही घटना (same incident) या एक ही लेन-देन (same transaction) से संबंधित हैं।”


🔹 3️⃣ क्या सभी एफ.आई.आर. “एक ही घटना” से संबंधित हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि —

  • पहली एफ.आई.आर. (224/2022) विश्व हिंदू परिषद पदाधिकारी ने दर्ज कराई थी,
    जिसमें उन्होंने कहा था कि “14 अप्रैल 2022 को चर्च में सामूहिक धर्मांतरण हो रहा था।”

  • जबकि बाद की एफ.आई.आर. (54, 55, 60/2023)
    अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा, अपने-अपने अनुभवों के आधार पर दर्ज कराई गईं।

न्यायालय ने कहा —

“यदि किसी अपराध का प्रभाव कई लोगों पर पड़ा हो,
तो प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है।”

“ऐसे मामलों में यह नहीं कहा जा सकता कि सभी रिपोर्टें ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ हैं।”


🔹 4️⃣ पहली एफ.आई.आर. की वैधता पर न्यायालय का मत

हाईकोर्ट ने कहा था कि एफ.आई.आर. 224/2022 अवैध है क्योंकि
वह “पीड़ित व्यक्ति” द्वारा नहीं बल्कि तीसरे व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क की जांच करते हुए कहा —

“सामान्य अपराधों में धारा 154 CrPC के तहत
कोई भी व्यक्ति, जिसे अपराध की जानकारी है, रिपोर्ट दर्ज करा सकता है।
परंतु U.P. Conversion Act की धारा 4(1) एक विशेष प्रावधान (special provision) है,
जो सामान्य कानून पर वरीयता रखता है।”

अर्थात:

  • यह विशेष अधिनियम “विशेष वर्ग के अपराध” को नियंत्रित करता है,
    इसलिए केवल वही व्यक्ति (पीड़ित/रिश्तेदार) शिकायत दर्ज कर सकता है।

  • अतः एफ.आई.आर. 224/2022 “कानूनी रूप से अवैध” मानी जाएगी।


🔹 5️⃣ बाद की एफ.आई.आर. का मूल्यांकन

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“जब पहली एफ.आई.आर. कानून के अनुसार दर्ज नहीं की गई,
तो वह ‘शून्य’ (non est in the eye of law) मानी जाएगी।
ऐसे में बाद में दर्ज की गई एफ.आई.आर. को
‘दूसरी’ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पहली वैध ही नहीं थी।”

इसलिए 54/2023, 55/2023 और 60/2023
स्वतंत्र और वैध एफ.आई.आर. मानी जाएँगी।


🔹 6️⃣ धारा 482 CrPC के प्रयोग पर न्यायालय की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“धारा 482 का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए
जहाँ अभियोजन पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण (malicious) हो
या अपराध के कोई तत्व ही न हों।”

यहाँ एफ.आई.आर. में —

  • अपराध के तत्व स्पष्ट हैं (लालच, धमकी, पहचान परिवर्तन),

  • कई व्यक्तियों के बयान हैं,

  • और पुलिस जांच के बाद चार्जशीट दाख़िल हो चुकी है।

इसलिए न्यायालय ने कहा कि —

“इस स्तर पर न्यायालय को जांच या अभियोजन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”


🔹 7️⃣ धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है,
परंतु यह स्वतंत्रता ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ के अधीन है।”

“यदि धर्मांतरण धोखे, लालच या दबाव से कराया जाए,
तो वह अनुच्छेद 25 द्वारा संरक्षित नहीं होगा।”

“किसी व्यक्ति का स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन उसका अधिकार है,
परंतु जब किसी व्यक्ति को झूठे प्रलोभन से धर्म बदलवाया जाए,
तो राज्य उसे रोक सकता है।”


🔹 8️⃣ पुलिस जांच और चार्जशीट पर अवलोकन

न्यायालय ने कहा —

“चार्जशीट का दाख़िल होना यह दर्शाता है कि
पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य मिले हैं जिनसे अपराध का संदेह बनता है।”
“इसलिए अब यह अदालत के विचाराधीन होगा कि क्या अभियोजन सिद्ध होता है या नहीं।”

“सुप्रीम कोर्ट इस स्तर पर साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता।”


🔹 9️⃣ संविधानिक दृष्टिकोण

न्यायालय ने कहा —

“राज्य को यह अधिकार है कि वह धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक शांति के बीच
उचित संतुलन स्थापित करे।”
“धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग किसी कमजोर वर्ग के शोषण के लिए नहीं किया जा सकता।”


🔹 10️⃣ पूर्व निर्णयों का संदर्भ

न्यायालय ने निम्न मामलों का उल्लेख किया —

  • Rev. Stanislaus vs State of Madhya Pradesh (1977) 1 SCC 677 –
    जिसमें कहा गया था कि
    “धर्म प्रचार का अधिकार ‘धर्मांतरण का अधिकार’ नहीं है।”

  • T.T. Antony और Upkar Singh के बीच संतुलन साधते हुए
    न्यायालय ने कहा —
    “हर केस के तथ्यों पर निर्भर करेगा कि कौन सी एफ.आई.आर. वैध है।”


🔹 11️⃣ न्यायालय का समग्र निष्कर्ष

“हम यह मानते हैं कि एफ.आई.आर. 224/2022 कानून के अनुसार वैध नहीं थी।
इसलिए बाद में दर्ज की गई एफ.आई.आर. (54, 55, 60/2023)
स्वतंत्र और वैध हैं, उन्हें रद्द नहीं किया जा सकता।”

“जहाँ तक एफ.आई.आर. 47/2023 और 538/2023 का प्रश्न है,
वे अलग-अलग घटनाओं और अलग अपराधों से संबंधित हैं;
इसलिए उन्हें भी रद्द करने का कोई आधार नहीं है।”

“धारा 482 CrPC के तहत सुप्रीम कोर्ट को
इस स्तर पर हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।”


🏛️ भाग G – निष्कर्ष और आदेश (Final Directions and Conclusion)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


🔹 1️⃣ न्यायालय की समग्र दृष्टि

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“हमने सभी पक्षों की दलीलें, रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य, और विधिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति या संस्था का नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक संतुलन और विधिक प्रक्रिया — इन तीनों के आपसी सामंजस्य का उदाहरण है।”


🔹 2️⃣ एफ.आई.आर. 224/2022 के संबंध में

“यह एफ.आई.आर. एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दर्ज की गई थी जो न तो पीड़ित था, न उसके परिजन।
चूँकि U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1)
स्पष्ट रूप से शिकायत का अधिकार केवल पीड़ित या उसके परिजनों को देती है,
अतः यह एफ.आई.आर. कानूनन वैध नहीं मानी जा सकती।”

इसलिए:
एफ.आई.आर. संख्या 224/2022 को “अमान्य” (void ab initio) घोषित किया गया।


🔹 3️⃣ एफ.आई.आर. 54/2023, 55/2023, 60/2023 के संबंध में

“ये तीनों एफ.आई.आर. अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा दर्ज कराई गईं,
जिनके बयानों में स्पष्ट है कि उन्हें झूठे वादों, आर्थिक प्रलोभन और धमकियों के माध्यम से
धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया गया।”

“इन रिपोर्टों में अपराध के प्रथम दृष्टया तत्व मौजूद हैं।
अतः इन्हें ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ नहीं कहा जा सकता।”

निर्णय:
इन तीनों एफ.आई.आर. और इनके आधार पर की गई पुलिस जांच वैध और यथावत मानी गई।


🔹 4️⃣ एफ.आई.आर. 47/2023 (व्यक्तिगत धर्मांतरण का मामला)

“यह एफ.आई.आर. पूरी तरह अलग घटना पर आधारित है —
इसमें शिकायतकर्ता स्वयं स्वीकार करता है कि वह किसी समय ईसाई बना,
बाद में हिन्दू धर्म में लौटा।
यह घटना न तो फतेहपुर चर्च की घटना से जुड़ी है,
न किसी अन्य याचिकाकर्ता से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित।”

निर्णय:
एफ.आई.आर. 47/2023 को भी रद्द करने का कोई आधार नहीं है।


🔹 5️⃣ एफ.आई.आर. 538/2023 (प्रयागराज की घटना)

“यह एफ.आई.आर. हिंसा, धमकी और उगाही जैसे गंभीर आरोपों से संबंधित है।
यद्यपि यह बाद की घटना है, परंतु यह पूरी तरह स्वतंत्र अपराध है।”

निर्णय:
एफ.आई.आर. 538/2023 और उससे जुड़ी चार्जशीट वैध और यथावत रहेंगी।


🔹 6️⃣ धारा 482 CrPC के अंतर्गत हस्तक्षेप का प्रश्न

न्यायालय ने कहा —

“यह न्यायालय केवल उन्हीं मामलों में एफ.आई.आर. रद्द कर सकता है
जहाँ मामला पूरी तरह से झूठा, दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से असंभव प्रतीत हो।”

“यहाँ आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अभियोजन निराधार है।”

इसलिए:

“धारा 482 CrPC के अंतर्गत कोई हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।”


🔹 7️⃣ संविधानिक दृष्टि से टिप्पणी

“संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है,
लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं कि वह दूसरों को दबाव, धोखे या लालच देकर धर्म बदलवाए।”

“राज्य का यह कर्तव्य है कि वह सामाजिक एकता और धार्मिक सद्भाव की रक्षा करे।”

“धर्मांतरण यदि स्वैच्छिक है, तो कोई अपराध नहीं;
परंतु यदि उसमें प्रलोभन, भय या असत्य कथन हो,
तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि संविधान की भावना के भी विरुद्ध है।”


🔹 8️⃣ न्यायालय के निर्देश

1️⃣ सभी याचिकाएँ, जिनमें एफ.आई.आर. रद्द करने की मांग की गई थी, खारिज की जाती हैं।
2️⃣ एफ.आई.आर. संख्या 224/2022 को अमान्य माना गया,
परंतु यह आदेश केवल इस एफ.आई.आर. तक सीमित रहेगा।
3️⃣ बाकी सभी एफ.आई.आर. (47/2023, 54/2023, 55/2023, 60/2023, 538/2023)
वैध घोषित की जाती हैं।
4️⃣ राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि
अभियुक्तों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो
और जांच निष्पक्ष रूप से पूरी हो।
5️⃣ अभियुक्त यदि उचित समझें, तो निचली अदालत में
जमानत अथवा आरोपमुक्ति (discharge) के लिए आवेदन कर सकते हैं।


🔹 9️⃣ अंतिम निष्कर्ष (Conclusion)

“सभी आपराधिक याचिकाएँ और विशेष अनुमति याचिकाएँ (SLPs) अस्वीकार की जाती हैं।
कोई आदेश लागत (costs) के संबंध में पारित नहीं किया जाता।”


🔹 10️⃣ न्यायालय की टिप्पणी (Obiter)

“यह न्यायालय यह दोहराता है कि
धार्मिक स्वतंत्रता भारत के संविधान की आत्मा है,
परंतु यह स्वतंत्रता दूसरों की स्वतंत्रता को कुचलकर नहीं दी जा सकती।”

“राज्य को यह दायित्व सौंपा गया है
कि वह कमजोर वर्गों को किसी भी प्रकार के मानसिक, आर्थिक या सामाजिक दबाव से
संरक्षण प्रदान करे।”


⚖️ अंतिम आदेश (Order)

“इन याचिकाओं को अस्वीकार किया जाता है।
सभी लंबित अंतरिम आवेदन भी निष्प्रभावी हो जाते हैं।”


🕊️ (न्यायमूर्ति संजय करोल)
🕊️ (न्यायमूर्ति संजय कुमार)
नई दिल्ली, दिनांक 23 अक्टूबर 2025