बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

एफ.आई.आर निरस्त की गयी सुप्रीम कोर्ट द्वारा केश - राजेन्द्र बिहारी लाल एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य 2025

 

🏛️ भाग A – तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (Factual Matrix)

राजेन्द्र बिहारी लाल एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
(रिट याचिका (फौ.) संख्या 123/2023 एवं सम्बद्ध आपराधिक अपीलें)


1. पृष्ठभूमि

इस मामले में याचिकाकर्ता (राजेन्द्र बिहारी लाल और अन्य) ने कई एफ.आई.आर. को निरस्त (quash) करने की मांग की है।
इन एफ.आई.आर. को भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं और उत्तर प्रदेश धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 (U.P. Conversion Act) के तहत दर्ज किया गया था।

कुल मिलाकर छह एफ.आई.आर. थीं — जिनका सार नीचे है:

क्रमांकएफ.आई.आर. संख्यातिथिथाना / जिलाधाराएँ
1224/202215.04.2022कोतवाली, फतेहपुरIPC 153A, 506, 420, 467, 468 व U.P. Conversion Act की धारा 3 व 5(1)
247/202320.01.2023कोतवाली, फतेहपुरIPC 120B व Conversion Act की धारा 3/5(1)
354/202323.01.2023कोतवाली, फतेहपुरIPC 420, 467, 468, 506, 120B व Conversion Act 3/5(1)
455/202323.01.2023कोतवाली, फतेहपुरवही उपरोक्त धाराएँ
560/202324.01.2023कोतवाली, फतेहपुरवही उपरोक्त धाराएँ
6538/202311.12.2023नवाबगंज, प्रयागराजIPC 307, 386, 504 व Conversion Act 3/5(1)

2. विवाद का केंद्र

मूल विवाद यह है कि क्या उपरोक्त एफ.आई.आर. — जो “धर्मांतरण” से संबंधित हैं —
वैध हैं या नहीं?
याचिकाकर्ता चाहते हैं कि इन सभी एफ.आई.आर. को निरस्त कर दिया जाए क्योंकि

  • या तो एक ही घटना पर कई एफ.आई.आर. दर्ज की गईं,

  • या वे कानूनी रूप से अयोग्य व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गईं,

  • या उनमें अपराध का कोई ठोस आधार नहीं है।


3. एफ.आई.आर. 224/2022 – पहली रिपोर्ट

यह एफ.आई.आर. 15 अप्रैल 2022 को विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष हिमांशु दीक्षित की शिकायत पर दर्ज हुई।
उनका आरोप था कि “Evangelical Church of India”, हरिहरगंज, फतेहपुर में
14 अप्रैल 2022 को “मंडी थर्सडे” के दिन लगभग 90 हिन्दू लोगों का ईसाई धर्म में जबरन धर्मांतरण किया जा रहा था।

उन्होंने कहा कि जब उन्होंने व उनके संगठन के सदस्य वहां पहुँचकर सूचना दी,
तो चर्च के “Father Vijay Masih” ने यह स्वीकार किया कि पिछले 34 दिनों से
लोगों को बहला-फुसलाकर और उनके दस्तावेज़ों में नाम बदलवाकर ईसाई बनाया जा रहा है।

इस रिपोर्ट में 35 नामित और लगभग 20 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया।

महत्त्वपूर्ण तथ्य:
हिमांशु दीक्षित स्वयं धर्मांतरण के शिकार नहीं थे;
वे सूचना देने वाले व्यक्ति थे (एक तरह से “whistleblower”)।
यह तथ्य बाद में कानूनी दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण बनता है।


4. एफ.आई.आर. 47/2023 – व्यक्तिगत धर्मांतरण का आरोप

20 जनवरी 2023 को सर्वेन्द्र विक्रम सिंह नामक व्यक्ति ने यह रिपोर्ट दर्ज कराई।
उन्होंने कहा कि उन्हें फतेहपुर में काम के दौरान
रामचंद्र नामक व्यक्ति ने ईसाई बनने का लालच दिया —
नकद धन, नौकरी, और विवाह का प्रस्ताव दिया गया।
बाद में उन्हें प्रयागराज के SHUATS विश्वविद्यालय में
कुछ व्यक्तियों (जिनमें वाइस-चांसलर R.B. Lal शामिल थे) से मिलवाया गया।
उन्होंने कथित रूप से 25 दिसंबर 2021 को “Presbyterian Church, देविगंज” में धर्म बदल लिया।
बाद में पछतावे के बाद उन्होंने फिर से हिन्दू धर्म अपना लिया।


5. एफ.आई.आर. 54/2023 – सामूहिक धर्मांतरण

23 जनवरी 2023 को वीरेंद्र कुमार ने यह रिपोर्ट दी कि
उन्हें और लगभग 90 अन्य हिन्दू लोगों को
14 अप्रैल 2022 को हरिहरगंज चर्च में ईसाई बनाने के लिए लालच और धमकी दी गई।
उनका कहना था कि उनका आधार कार्ड लेकर नाम बदल दिया गया —
“वीरेंद्र डी'सूज़ा” कर दिया गया —
और धमकी दी गई कि यदि हिन्दू धर्म में लौटे तो “यीशु भगवान नाराज़ होकर सज़ा देंगे”।


6. एफ.आई.आर. 55/2023

सिर्फ सात मिनट बाद, एक और रिपोर्ट संजय सिंह नामक व्यक्ति ने
उसी थाने में, उसी घटना पर दर्ज कराई।
शिकायत की भाषा लगभग समान थी —
बस नाम और व्यक्तिगत विवरण अलग थे।
उनका नया नाम “संजय अल्बर्ट फ्रांसिस” बताकर आधार कार्ड बदला गया था।


7. एफ.आई.आर. 60/2023

24 जनवरी 2023 को सत्यपाल नामक व्यक्ति ने वही आरोप लगाए —
इसी चर्च, वही तारीख़, वही घटनाक्रम, वही प्रकार का कथित धर्मांतरण।


8. एफ.आई.आर. 538/2023

यह रिपोर्ट 11 दिसंबर 2023 को नवाबगंज, प्रयागराज थाने में दर्ज हुई।
इसमें एक नए आरोपकर्ता संजीव कुमार ने कहा कि
आरोपियों ने उसे गोली मारने की कोशिश की, ₹1 लाख मांगे,
और वह व्यक्ति भी अवैध धर्मांतरण करवाने में लिप्त है।


9. घटनाओं का सारांश

कुल मिलाकर, तीन अलग-अलग घटनाएँ सामने आईं —
1️⃣ 14.04.2022 – फतेहपुर चर्च में कथित सामूहिक धर्मांतरण (एफ.आई.आर. 224/2022, 54/2023, 55/2023, 60/2023)
2️⃣ 25.12.2021 – व्यक्तिगत धर्मांतरण (एफ.आई.आर. 47/2023)
3️⃣ 10.12.2023 – प्रयागराज घटना (एफ.आई.आर. 538/2023)


10. जांच की स्थिति

सभी एफ.आई.आर. में अब तक जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दायर की जा चुकी है।
फिर भी याचिकाकर्ता चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इन एफ.आई.आर. और उनके आधार पर चली सारी कार्यवाही को निरस्त करे।


🏛️ भाग B – उच्च न्यायालय के आदेश (Impugned Judgments)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of U.P. & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ पृष्ठभूमि

उपरोक्त सभी एफ.आई.आर. के खिलाफ अलग-अलग याचिकाएँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर की गई थीं,
जिनमें मांग की गई थी कि

“इन एफ.आई.आर. को रद्द किया जाए क्योंकि ये एक ही घटना से संबंधित हैं या इनका कोई कानूनी आधार नहीं है।”

हालाँकि, उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाएँ खारिज कर दीं,
और यही आदेश सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए गए।

नीचे हर आदेश का सारांश दिया गया है 👇


2️⃣ 2 जून 2023 का साझा आदेश

तीन अपीलें — SLP (Cr.) Nos. 7380/2023, 13679/2023, और 7233/2023 —
इसी एक साझा आदेश से जुड़ी हैं।

हाईकोर्ट की प्रमुख बातें:

  • याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ये एफ.आई.आर. बहुत देरी से दर्ज की गई हैं (एक साल बाद)।

  • पहले से एफ.आई.आर. 224/2022 दर्ज थी, इसलिए बाद की एफ.आई.आर. (54, 55, 60)
    “एक ही घटना” पर “दूसरी एफ.आई.आर.” हैं — जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय
    T.T. Antony vs State of Kerala (2001) 6 SCC 181 के अनुसार अमान्य है।

  • लेकिन राज्य सरकार ने कहा कि पहले भी ऐसे ही मामले में एक समन्वय पीठ (Coordinate Bench)
    ने इसी प्रकार की याचिका खारिज की थी।

हाईकोर्ट का निष्कर्ष:

“एफ.आई.आर. 224/2022 को एक ऐसे व्यक्ति ने दर्ज कराया जो धर्मांतरण का शिकार नहीं था,
इसलिए वह ‘अनधिकृत व्यक्ति’ था।
अतः बाद की एफ.आई.आर. (54, 55, 60) पहली वैध रिपोर्ट मानी जाएंगी,
न कि दूसरी एफ.आई.आर.।”

इस आधार पर याचिकाएँ खारिज कर दी गईं।


3️⃣ 5 जुलाई 2023 का आदेश

यह आदेश SLP (Cr.) No. 10187/2023 से संबंधित है (एफ.आई.आर. 60/2023)।
हाईकोर्ट ने कहा कि —
पहले से ही इसी एफ.आई.आर. पर एक अन्य याचिका खारिज की जा चुकी है,
इसलिए “नई याचिका” में विचार का कोई औचित्य नहीं है।


4️⃣ 4 अगस्त 2023 का आदेश

SLP (Cr.) No. 13231/2023 — एफ.आई.आर. 54/2023 से संबंधित था।

हाईकोर्ट ने कहा:

  • यह तर्क कि यह “दूसरी एफ.आई.आर.” है, पहले ही नकारा जा चुका है।

  • एफ.आई.आर. में अपराध के “संज्ञेय तत्व (Cognizable Offence)” हैं,
    इसलिए इसे निरस्त नहीं किया जा सकता।


5️⃣ 28 अगस्त 2023 का आदेश

SLP (Cr.) Nos. 15251–15254/2023 (एफ.आई.आर. 60/2023 से जुड़ी याचिकाएँ)।
हाईकोर्ट ने कहा कि —

“अभियोग में गंभीर आरोप हैं; अपराध स्पष्ट रूप से संज्ञेय है;
इसलिए एफ.आई.आर. रद्द करने का कोई आधार नहीं है।”

साथ ही यह भी कहा गया कि

“कुछ अन्य सह-आरोपियों की याचिकाएँ पहले ही खारिज हो चुकी हैं,
इसलिए यह भी खारिज की जाती है।”


6️⃣ 17 फरवरी 2023 का आदेश (एफ.आई.आर. 54/2023)

यह आदेश सबसे महत्वपूर्ण है — (SLP (Cr.) No. 3818/2023)।

यहाँ हाईकोर्ट ने सीधे T.T. Antony बनाम केरल राज्य (2001) के सिद्धांत पर विचार किया।

मुख्य विचार:

  • एफ.आई.आर. 224/2022 और 54/2023 एक ही घटना (14.04.2022) से संबंधित हैं।

  • यदि केवल इस आधार पर देखें, तो यह “दूसरी एफ.आई.आर.” होती —
    लेकिन U.P. Conversion Act की धारा 4 यह निर्धारित करती है
    कि शिकायत केवल “पीड़ित व्यक्ति या उसके रिश्तेदार” ही दर्ज करा सकते हैं।

  • चूँकि एफ.आई.आर. 224/2022 विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी ने दर्ज कराई थी,
    वह “पीड़ित” नहीं था — इसलिए यह अमान्य एफ.आई.आर. मानी गई।

इसलिए निष्कर्ष:

“एफ.आई.आर. 54/2023 ही वास्तविक वैध एफ.आई.आर. है;
यह ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ नहीं बल्कि पहली सही एफ.आई.आर.’ मानी जाएगी।”

हाईकोर्ट ने कहा —
एफ.आई.आर. में अपराध के तत्व मौजूद हैं,
इसलिए इसे रद्द नहीं किया जा सकता।


7️⃣ 17 फरवरी 2023 का एक अन्य आदेश

(SLP (Cr.) No. 10555/2024 — एफ.आई.आर. 55/2023)
यहाँ आरोपी एक संगीत शिक्षक था।
उसने कहा कि वह केवल कार्यक्रम में गाना बजा रहा था,
धर्मांतरण से कोई संबंध नहीं था।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा —

“एफ.आई.आर. में गंभीर सामाजिक प्रभाव वाले आरोप हैं;
इसलिए गहराई से जांच जरूरी है,
और संभवतः ‘कस्टोडियल इंटरोगेशन’ की भी आवश्यकता हो सकती है।”
याचिका खारिज।


8️⃣ 29 अप्रैल 2024 का आदेश (एफ.आई.आर. 538/2023)

(SLP (Cr.) No. 8615/2024)
यह प्रयागराज की घटना से संबंधित था।
हाईकोर्ट ने कहा —

“एफ.आई.आर. के साधारण अध्ययन से ही यह प्रतीत होता है
कि आरोप प्रथमदृष्टया सही हैं।”
इसलिए धारा 482 CrPC के तहत पूरी कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया।


🔹 सारांश (High Court Findings Summary)

एफ.आई.आर.हाईकोर्ट का दृष्टिकोणपरिणाम
224/2022अमान्य (पीड़ित द्वारा दर्ज नहीं)कोई राहत नहीं
54, 55, 60/2023वैध; अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता हैयाचिका खारिज
47/2023वैध; शिकायतकर्ता स्वयं धर्मांतरित व्यक्तियाचिका खारिज
538/2023प्रयागराज का मामला; साक्ष्य पर्याप्तयाचिका खारिज

🏛️ भाग C – याचिकाकर्ताओं के तर्क (Submissions on behalf of Petitioners)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं —
श्री मुकुल रोहतगी, श्री सिद्धार्थ लूथरा और श्री आनंद ग्रोवर ने पक्ष रखा।

उन्होंने न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट रूप से कहा कि
इन सभी एफ.आई.आर. का उद्देश्य न्याय नहीं बल्कि उत्पीड़न है।


2️⃣ पहला प्रमुख तर्क — “एक ही घटना पर अनेक एफ.आई.आर. अमान्य हैं”

  • सभी एफ.आई.आर. (224/2022, 54/2023, 55/2023, 60/2023)
    एक ही घटना — 14 अप्रैल 2022 को हरिहरगंज, फतेहपुर के Evangelical Church of India — से संबंधित हैं।

  • केवल शिकायतकर्ता अलग-अलग हैं, घटना एक ही है।

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्णय T.T. Antony vs State of Kerala (2001) 6 SCC 181 के अनुसार,
    “एक ही घटना पर दूसरी एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की जा सकती।”

इसलिए — बाद की सभी एफ.आई.आर. स्वतः अमान्य हैं।

उन्होंने कहा कि यदि हर व्यक्ति जिसे घटना के बारे में पता है,
अलग-अलग एफ.आई.आर. दर्ज कराने लगे,
तो यह कानून के सिद्धांतों का दुरुपयोग होगा।


3️⃣ दूसरा प्रमुख तर्क — “पहली एफ.आई.आर. वैध थी”

  • हाईकोर्ट ने यह मान लिया कि एफ.आई.आर. 224/2022 अवैध है क्योंकि
    वह “पीड़ित व्यक्ति” द्वारा नहीं बल्कि VHP के सदस्य द्वारा दर्ज की गई थी।

  • लेकिन धारा 154 CrPC में कहीं नहीं लिखा है कि
    केवल “पीड़ित व्यक्ति” ही रिपोर्ट दर्ज करा सकता है।
    कोई भी व्यक्ति, जिसे अपराध की जानकारी है, एफ.आई.आर. दर्ज करा सकता है।

  • इसलिए 224/2022 ही पहली वैध एफ.आई.आर. थी,
    और उसके बाद की सभी रिपोर्टें “दूसरी एफ.आई.आर.” मानी जाएंगी,
    जिन्हें निरस्त किया जाना चाहिए।


4️⃣ तीसरा तर्क — “U.P. Conversion Act की धारा 4 का गलत प्रयोग”

  • हाईकोर्ट ने कहा कि U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1) के अनुसार
    शिकायत केवल “पीड़ित व्यक्ति, उसके माता-पिता, भाई-बहन, या कानूनी अभिभावक” ही कर सकते हैं।

  • परंतु याचिकाकर्ताओं ने बताया कि इस धारा का उद्देश्य “व्यक्तिगत धर्मांतरण” पर नियंत्रण है,
    न कि “सामूहिक घटनाओं” पर।

  • यदि किसी जगह सामूहिक धर्मांतरण चल रहा हो,
    तो कोई भी नागरिक (whistleblower) पुलिस को सूचना दे सकता है।

  • अतः एफ.आई.आर. 224/2022 वैध है;
    हाईकोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की।


5️⃣ चौथा तर्क — “कई एफ.आई.आर. केवल राजनीतिक दबाव से दर्ज हुईं”

  • याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि
    राजनीतिक प्रभाव और मीडिया दबाव के कारण बार-बार नई एफ.आई.आर. दर्ज की गईं।

  • चार एफ.आई.आर. एक ही घटना पर अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा
    केवल कुछ मिनटों या घंटों के अंतर पर दर्ज की गईं।

  • इस तरह की पुनरावृत्ति कानून के अनुचित प्रयोग (Abuse of Process of Law) के समान है।


6️⃣ पाँचवाँ तर्क — “कानूनी दृष्टि से अपराध का गठन नहीं होता”

  • सभी एफ.आई.आर. में केवल “आरोप” हैं,
    कोई ठोस साक्ष्य नहीं कि किसी व्यक्ति ने वास्तव में जबरन धर्म बदला हो।

  • किसी भी एफ.आई.आर. में यह नहीं बताया गया कि
    किसी व्यक्ति ने शपथपूर्वक कहा कि उसे धमकाया गया, लुभाया गया, या दबाव डाला गया।

  • केवल सामान्य कथन हैं —
    जैसे “लालच दिया गया”, “नाम बदल दिया गया”, आदि —
    जो किसी दंडनीय अपराध का ठोस आधार नहीं हैं।


7️⃣ छठा तर्क — “शैक्षणिक संस्था पर बेबुनियाद आरोप”

  • मुख्य आरोपी राजेन्द्र बिहारी लाल, Sam Higginbottom University of Agriculture, Technology & Sciences (SHUATS) के वाइस-चांसलर हैं।

  • उनका काम धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन चलाना है।

  • याचिकाकर्ता का कहना था कि विश्वविद्यालय के अंदर धार्मिक संगठन या मिशन स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं,
    और प्रशासन का उनसे कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।


8️⃣ सातवाँ तर्क — “चार्जशीट दाख़िल होने से एफ.आई.आर. वैध नहीं हो जाती”

राज्य सरकार ने यह कहा कि चूँकि चार्जशीट दाख़िल हो चुकी है,
अब एफ.आई.आर. को रद्द नहीं किया जा सकता।
परंतु याचिकाकर्ताओं ने कहा —

“चार्जशीट केवल पुलिस की राय होती है;
यदि एफ.आई.आर. ही गैरकानूनी है,
तो उसके आधार पर बनी चार्जशीट भी टिक नहीं सकती।”

इसलिए सुप्रीम कोर्ट को पूरे अभियोजन को निरस्त करना चाहिए।


9️⃣ आठवाँ तर्क — “धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन”

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार करने की स्वतंत्रता देता है।

  • यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी अन्य धर्म को स्वीकार करता है,
    तो उसे “जबरन धर्मांतरण” नहीं कहा जा सकता।

  • राज्य सरकार ने “धर्मांतरण” को अपराध बनाकर संविधान की भावना का उल्लंघन किया है।


🔹 निष्कर्ष (याचिकाकर्ताओं की ओर से)

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि —
1️⃣ सभी एफ.आई.आर. एक ही घटना से जुड़ी हैं, अतः दूसरी एफ.आई.आर. अमान्य हैं।
2️⃣ पहली एफ.आई.आर. 224/2022 वैध थी; उसे अनदेखा करना कानून के विपरीत है।
3️⃣ आरोप अस्पष्ट हैं, साक्ष्य नहीं हैं, और यह सब राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है।
4️⃣ अतः सुप्रीम कोर्ट को इन सभी एफ.आई.आर. व संबंधित कार्यवाही को धारा 482 CrPC के तहत निरस्त करना चाहिए।


🏛️ भाग D – राज्य सरकार के तर्क (Submissions on behalf of the State of U.P.)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ अधिवक्ता की प्रस्तुति

उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से महाधिवक्ता (Advocate General) श्री अजय कुमार मिश्रा एवं अपर महाधिवक्ता श्री विनीत कुमार शुक्ला ने पक्ष रखा।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा कि —

“यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति के अधिकारों का नहीं, बल्कि सामाजिक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था का है।”

राज्य का तर्क था कि —

“धर्मांतरण के नाम पर ठगी, झूठे वादे और सामाजिक असंतुलन पैदा किया गया।
इसलिए कानून का कठोर रूप से प्रयोग आवश्यक था।”


2️⃣ पहला तर्क — “एफ.आई.आर. वैध और स्वतंत्र हैं”

राज्य ने कहा कि —

  • सभी एफ.आई.आर. में अलग-अलग पीड़ित व्यक्ति हैं,
    जिन्होंने अपने-अपने अनुभव के आधार पर शिकायतें दीं।

  • यदि एक ही स्थान पर अलग-अलग लोगों के साथ अपराध हुआ,
    तो प्रत्येक व्यक्ति की रिपोर्ट “अलग अपराध” के रूप में दर्ज की जा सकती है।

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Upkar Singh vs Ved Prakash (2004) 13 SCC 292 में कहा गया है कि
    यदि “अलग-अलग पीड़ित” हों, तो “दूसरी एफ.आई.आर.” भी मान्य होगी।

इसलिए सभी एफ.आई.आर. वैध हैं।


3️⃣ दूसरा तर्क — “पहली एफ.आई.आर. (224/2022) कानूनन अमान्य थी”

  • U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1) कहती है कि
    शिकायत केवल “पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार/अभिभावक” ही दर्ज करा सकते हैं।

  • एफ.आई.आर. 224/2022 VHP पदाधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई थी,
    जो घटना का प्रत्यक्ष शिकार नहीं था।

  • अतः यह एफ.आई.आर. कानूनी रूप से निरर्थक (non est) थी।

राज्य का कहना था कि —

“यदि पहली रिपोर्ट अवैध थी,
तो बाद में दर्ज हुई एफ.आई.आर. को ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ नहीं कहा जा सकता।
वे वास्तविक पहली रिपोर्ट हैं।”


4️⃣ तीसरा तर्क — “पीड़ितों ने स्वयं आरोप लगाए हैं”

  • एफ.आई.आर. 54/2023, 55/2023 और 60/2023 में
    शिकायतकर्ताओं ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें
    धर्म बदलने के लिए लालच, डर, और झूठे वादे दिए गए।

  • कुछ मामलों में उन्होंने यह भी कहा कि
    उनके आधार कार्ड पर नाम बदले गए,
    जिससे उनकी पहचान बदल दी गई।

  • यह सभी कार्य U.P. Conversion Act की धारा 3 और 5(1) के तहत
    “जबरन धर्मांतरण” की श्रेणी में आते हैं।


5️⃣ चौथा तर्क — “राज्य का कर्तव्य है समाज की रक्षा करना”

राज्य ने जोर दिया कि —

“धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि कोई संगठन
गरीब, अशिक्षित या कमजोर वर्ग के लोगों को
पैसे, नौकरी या चिकित्सा की लालच देकर धर्म बदलने पर मजबूर करे।”

  • संविधान का अनुच्छेद 25 “धार्मिक स्वतंत्रता” देता है,
    लेकिन यह अधिकार “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन है।

  • यदि धर्मांतरण के कारण सामाजिक तनाव और हिंसा की संभावना हो,
    तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।


6️⃣ पाँचवाँ तर्क — “पुलिस जांच निष्पक्ष रही है”

राज्य ने बताया कि —

  • प्रत्येक एफ.आई.आर. की जांच स्वतंत्र पुलिस अधिकारियों ने की।

  • पुलिस ने बयान दर्ज किए, दस्तावेज़ एकत्र किए,
    और चार्जशीट दाख़िल की, जिन्हें अब अदालत ने संज्ञान में लिया है।

  • याचिकाकर्ताओं को चार्जशीट पर विचारणीय अदालत में अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

इसलिए इस स्तर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा एफ.आई.आर. निरस्त करना उचित नहीं है।


7️⃣ छठा तर्क — “धारा 482 CrPC का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए”

राज्य ने कहा कि —

“धारा 482 का उद्देश्य न्यायालय की प्रक्रिया को सुरक्षित रखना है,
न कि हर जांच या अभियोजन को रोकना।”

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार (जैसे State of Haryana v. Bhajan Lal, 1992 Supp (1) SCC 335)
यह कहा है कि जब संज्ञेय अपराध के तत्व दिखाई देते हैं,
तो न्यायालय को एफ.आई.आर. रद्द करने से बचना चाहिए।

यह मामला भी “प्रथम दृष्टया” अपराध दर्शाता है।


8️⃣ सातवाँ तर्क — “याचिकाकर्ता प्रभावशाली व्यक्ति हैं”

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि —

  • याचिकाकर्ता विश्वविद्यालय के उच्च पदों पर हैं,
    और वे स्वयं को “धर्मिक प्रचार” से अलग दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

  • परंतु जांच में ऐसे दस्तावेज़ और गवाह मिले हैं
    जो दिखाते हैं कि विश्वविद्यालय परिसर और चर्च गतिविधियाँ
    एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ी थीं।

  • इसलिए यह कहना कि “वे केवल शैक्षणिक कार्य करते हैं” गलत है।


9️⃣ आठवाँ तर्क — “धर्मांतरण का प्रभाव समाज पर गहरा है”

राज्य ने सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाया कि —

“धर्मांतरण के ऐसे मामले केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन का कारण बनते हैं।”
“यदि इसे बिना रोक-टोक चलने दिया जाए,
तो इससे सांप्रदायिक तनाव और हिंसा फैल सकती है।”

इसलिए कानून का उद्देश्य ‘धर्म पर रोक’ नहीं बल्कि ‘धोखे या दबाव से होने वाले धर्मांतरण पर रोक’ है।


🔹 राज्य का निष्कर्ष

1️⃣ पहली एफ.आई.आर. 224/2022 कानूनन अमान्य थी।
2️⃣ बाद की एफ.आई.आर. अलग-अलग पीड़ितों द्वारा दर्ज वैध शिकायतें हैं।
3️⃣ पुलिस जांच निष्पक्ष व प्रमाणिक है; चार्जशीट दायर हो चुकी है।
4️⃣ धारा 482 CrPC के तहत एफ.आई.आर. निरस्त करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
5️⃣ यह मामला “जनहित” और “सामाजिक व्यवस्था” से जुड़ा है — इसलिए न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।


🏛️ भाग E – सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचारणीय प्रश्न (Issues for Consideration)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


1️⃣ प्रस्तावना

दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद,
सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि यह मामला केवल एक व्यक्ति या संस्था का नहीं,
बल्कि इसमें संविधानिक स्वतंत्रता (Freedom of Religion),
फौजदारी प्रक्रिया (Criminal Law Principles) और
सामाजिक व्यवस्था (Public Order)
तीनों के बीच संतुलन का प्रश्न शामिल है।


2️⃣ मुख्य प्रश्न

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में निम्नलिखित प्रमुख प्रश्न तय किए जाने आवश्यक हैं 👇


प्रश्न 1:

क्या जब एक ही घटना से संबंधित अपराध पर एक एफ.आई.आर. पहले से दर्ज हो चुकी हो,
तो उसी घटना के बारे में अन्य व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गई एफ.आई.आर.
“दूसरी एफ.आई.आर.” मानी जाएगी और इसलिए अवैध होगी?


प्रश्न 2:

क्या U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1)
इस बात को पूरी तरह सीमित करती है कि शिकायत केवल
“पीड़ित व्यक्ति या उसके रिश्तेदार” ही दर्ज करा सकते हैं —
या क्या कोई “साधारण नागरिक” भी, यदि वह किसी अपराध को देखे,
एफ.आई.आर. दर्ज करा सकता है?


प्रश्न 3:

क्या एफ.आई.आर. 224/2022 (जो विश्व हिन्दू परिषद पदाधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई थी)
को “वैध प्रथम रिपोर्ट” माना जा सकता है?
यदि हाँ, तो क्या उसके बाद दर्ज की गई एफ.आई.आर.
“दूसरी एफ.आई.आर.” के रूप में निरस्त हो जाएंगी?


प्रश्न 4:

क्या इस मामले में आरोपों की प्रकृति इतनी गंभीर है कि
सुप्रीम कोर्ट को धारा 482 CrPC के तहत हस्तक्षेप से बचना चाहिए?
या फिर यह मामला ऐसा है जहाँ न्यायालय को “न्याय की रक्षा” के लिए
एफ.आई.आर. रद्द करनी चाहिए?


प्रश्न 5:

क्या धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25)
“स्वैच्छिक धर्मांतरण” को भी संरक्षण देती है,
या राज्य को यह अधिकार है कि वह “जबरन / प्रलोभन से किए गए धर्मांतरण” पर
कानूनी रोक लगाए?


3️⃣ सहायक प्रश्न

इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि निम्न मुद्दों पर स्पष्टता आवश्यक है —

  • क्या पुलिस को अधिकार है कि वह कई शिकायतों को मिलाकर
    एक ही जांच (Consolidated Investigation) करे?

  • क्या आरोपपत्र (Charge Sheet) दाख़िल हो जाने के बाद
    एफ.आई.आर. को निरस्त करने की मांग की जा सकती है?

  • क्या संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत
    “धार्मिक प्रचार” और “धर्मांतरण” के बीच कोई वैधानिक अंतर है?


4️⃣ न्यायालय का दृष्टिकोण

न्यायालय ने कहा —

“इन प्रश्नों का समाधान केवल तकनीकी रूप से नहीं किया जा सकता।
यहाँ यह देखना आवश्यक है कि क्या दर्ज हुई एफ.आई.आर.
वास्तव में एक ही ‘लेन-देन’ (transaction) से जुड़ी हैं
या वे अलग-अलग अपराधों की श्रेणी में आती हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि —

“धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था
दोनों ही संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त मूल्य (constitutional values) हैं;
इसलिए निर्णय इन दोनों के बीच उचित संतुलन पर आधारित होगा।”


🔹 सारांश (Issues Recap)

क्रमविचारणीय प्रश्नविषय
1दूसरी एफ.आई.आर. का वैधानिकता प्रश्नएक ही घटना पर कई रिपोर्टें
2धारा 4(1) U.P. Conversion Act की व्याख्याशिकायत दर्ज करने का अधिकार
3पहली एफ.आई.आर. की वैधताक्या 224/2022 असली रिपोर्ट थी
4धारा 482 CrPC के तहत हस्तक्षेपएफ.आई.आर. रद्द करने का अधिकार
5धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक व्यवस्थासंविधानिक संतुलन

🏛️ भाग F – सुप्रीम कोर्ट का विधिक विश्लेषण (Court’s Legal Analysis and Reasoning)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


🔹 1️⃣ प्रारंभिक टिप्पणी

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संजय कुमार की खंडपीठ ने यह कहा —

“यह मामला केवल तकनीकी या प्रक्रिया संबंधी विवाद नहीं है;
यह संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और
राज्य द्वारा सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के अधिकार –
इन दोनों के संतुलन का प्रश्न है।”


🔹 2️⃣ “दूसरी एफ.आई.आर.” का सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने पहले यह देखा कि याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था —
‘एक ही घटना पर दूसरी एफ.आई.आर. अवैध है’।

इसके लिए उन्होंने निम्न निर्णयों का उल्लेख किया 👇

  1. T.T. Antony v. State of Kerala (2001) 6 SCC 181

  2. Upkar Singh v. Ved Prakash (2004) 13 SCC 292

  3. Babubhai v. State of Gujarat (2010) 12 SCC 254


⚖️ न्यायालय की व्याख्या

  • T.T. Antony में कहा गया था कि यदि “एक ही लेन-देन” (same transaction) पर
    एक से अधिक एफ.आई.आर. दर्ज की जाएँ,
    तो दूसरी एफ.आई.आर. अवैध होगी।

  • परंतु Upkar Singh के निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि
    यदि नई एफ.आई.आर. अलग अपराध या अलग पीड़ित व्यक्ति से संबंधित हो,
    तो वह वैध मानी जाएगी।

“इसलिए, यह देखना आवश्यक है कि क्या सभी एफ.आई.आर.
एक ही घटना (same incident) या एक ही लेन-देन (same transaction) से संबंधित हैं।”


🔹 3️⃣ क्या सभी एफ.आई.आर. “एक ही घटना” से संबंधित हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि —

  • पहली एफ.आई.आर. (224/2022) विश्व हिंदू परिषद पदाधिकारी ने दर्ज कराई थी,
    जिसमें उन्होंने कहा था कि “14 अप्रैल 2022 को चर्च में सामूहिक धर्मांतरण हो रहा था।”

  • जबकि बाद की एफ.आई.आर. (54, 55, 60/2023)
    अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा, अपने-अपने अनुभवों के आधार पर दर्ज कराई गईं।

न्यायालय ने कहा —

“यदि किसी अपराध का प्रभाव कई लोगों पर पड़ा हो,
तो प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है।”

“ऐसे मामलों में यह नहीं कहा जा सकता कि सभी रिपोर्टें ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ हैं।”


🔹 4️⃣ पहली एफ.आई.आर. की वैधता पर न्यायालय का मत

हाईकोर्ट ने कहा था कि एफ.आई.आर. 224/2022 अवैध है क्योंकि
वह “पीड़ित व्यक्ति” द्वारा नहीं बल्कि तीसरे व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क की जांच करते हुए कहा —

“सामान्य अपराधों में धारा 154 CrPC के तहत
कोई भी व्यक्ति, जिसे अपराध की जानकारी है, रिपोर्ट दर्ज करा सकता है।
परंतु U.P. Conversion Act की धारा 4(1) एक विशेष प्रावधान (special provision) है,
जो सामान्य कानून पर वरीयता रखता है।”

अर्थात:

  • यह विशेष अधिनियम “विशेष वर्ग के अपराध” को नियंत्रित करता है,
    इसलिए केवल वही व्यक्ति (पीड़ित/रिश्तेदार) शिकायत दर्ज कर सकता है।

  • अतः एफ.आई.आर. 224/2022 “कानूनी रूप से अवैध” मानी जाएगी।


🔹 5️⃣ बाद की एफ.आई.आर. का मूल्यांकन

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“जब पहली एफ.आई.आर. कानून के अनुसार दर्ज नहीं की गई,
तो वह ‘शून्य’ (non est in the eye of law) मानी जाएगी।
ऐसे में बाद में दर्ज की गई एफ.आई.आर. को
‘दूसरी’ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पहली वैध ही नहीं थी।”

इसलिए 54/2023, 55/2023 और 60/2023
स्वतंत्र और वैध एफ.आई.आर. मानी जाएँगी।


🔹 6️⃣ धारा 482 CrPC के प्रयोग पर न्यायालय की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“धारा 482 का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए
जहाँ अभियोजन पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण (malicious) हो
या अपराध के कोई तत्व ही न हों।”

यहाँ एफ.आई.आर. में —

  • अपराध के तत्व स्पष्ट हैं (लालच, धमकी, पहचान परिवर्तन),

  • कई व्यक्तियों के बयान हैं,

  • और पुलिस जांच के बाद चार्जशीट दाख़िल हो चुकी है।

इसलिए न्यायालय ने कहा कि —

“इस स्तर पर न्यायालय को जांच या अभियोजन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”


🔹 7️⃣ धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है,
परंतु यह स्वतंत्रता ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ के अधीन है।”

“यदि धर्मांतरण धोखे, लालच या दबाव से कराया जाए,
तो वह अनुच्छेद 25 द्वारा संरक्षित नहीं होगा।”

“किसी व्यक्ति का स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन उसका अधिकार है,
परंतु जब किसी व्यक्ति को झूठे प्रलोभन से धर्म बदलवाया जाए,
तो राज्य उसे रोक सकता है।”


🔹 8️⃣ पुलिस जांच और चार्जशीट पर अवलोकन

न्यायालय ने कहा —

“चार्जशीट का दाख़िल होना यह दर्शाता है कि
पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य मिले हैं जिनसे अपराध का संदेह बनता है।”
“इसलिए अब यह अदालत के विचाराधीन होगा कि क्या अभियोजन सिद्ध होता है या नहीं।”

“सुप्रीम कोर्ट इस स्तर पर साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता।”


🔹 9️⃣ संविधानिक दृष्टिकोण

न्यायालय ने कहा —

“राज्य को यह अधिकार है कि वह धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक शांति के बीच
उचित संतुलन स्थापित करे।”
“धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग किसी कमजोर वर्ग के शोषण के लिए नहीं किया जा सकता।”


🔹 10️⃣ पूर्व निर्णयों का संदर्भ

न्यायालय ने निम्न मामलों का उल्लेख किया —

  • Rev. Stanislaus vs State of Madhya Pradesh (1977) 1 SCC 677 –
    जिसमें कहा गया था कि
    “धर्म प्रचार का अधिकार ‘धर्मांतरण का अधिकार’ नहीं है।”

  • T.T. Antony और Upkar Singh के बीच संतुलन साधते हुए
    न्यायालय ने कहा —
    “हर केस के तथ्यों पर निर्भर करेगा कि कौन सी एफ.आई.आर. वैध है।”


🔹 11️⃣ न्यायालय का समग्र निष्कर्ष

“हम यह मानते हैं कि एफ.आई.आर. 224/2022 कानून के अनुसार वैध नहीं थी।
इसलिए बाद में दर्ज की गई एफ.आई.आर. (54, 55, 60/2023)
स्वतंत्र और वैध हैं, उन्हें रद्द नहीं किया जा सकता।”

“जहाँ तक एफ.आई.आर. 47/2023 और 538/2023 का प्रश्न है,
वे अलग-अलग घटनाओं और अलग अपराधों से संबंधित हैं;
इसलिए उन्हें भी रद्द करने का कोई आधार नहीं है।”

“धारा 482 CrPC के तहत सुप्रीम कोर्ट को
इस स्तर पर हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।”


🏛️ भाग G – निष्कर्ष और आदेश (Final Directions and Conclusion)

(Rajendra Bihari Lal & Another vs State of Uttar Pradesh & Others, 2025 INSC 1249)


🔹 1️⃣ न्यायालय की समग्र दृष्टि

सुप्रीम कोर्ट ने कहा —

“हमने सभी पक्षों की दलीलें, रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य, और विधिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति या संस्था का नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक संतुलन और विधिक प्रक्रिया — इन तीनों के आपसी सामंजस्य का उदाहरण है।”


🔹 2️⃣ एफ.आई.आर. 224/2022 के संबंध में

“यह एफ.आई.आर. एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दर्ज की गई थी जो न तो पीड़ित था, न उसके परिजन।
चूँकि U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 4(1)
स्पष्ट रूप से शिकायत का अधिकार केवल पीड़ित या उसके परिजनों को देती है,
अतः यह एफ.आई.आर. कानूनन वैध नहीं मानी जा सकती।”

इसलिए:
एफ.आई.आर. संख्या 224/2022 को “अमान्य” (void ab initio) घोषित किया गया।


🔹 3️⃣ एफ.आई.आर. 54/2023, 55/2023, 60/2023 के संबंध में

“ये तीनों एफ.आई.आर. अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा दर्ज कराई गईं,
जिनके बयानों में स्पष्ट है कि उन्हें झूठे वादों, आर्थिक प्रलोभन और धमकियों के माध्यम से
धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया गया।”

“इन रिपोर्टों में अपराध के प्रथम दृष्टया तत्व मौजूद हैं।
अतः इन्हें ‘दूसरी एफ.आई.आर.’ नहीं कहा जा सकता।”

निर्णय:
इन तीनों एफ.आई.आर. और इनके आधार पर की गई पुलिस जांच वैध और यथावत मानी गई।


🔹 4️⃣ एफ.आई.आर. 47/2023 (व्यक्तिगत धर्मांतरण का मामला)

“यह एफ.आई.आर. पूरी तरह अलग घटना पर आधारित है —
इसमें शिकायतकर्ता स्वयं स्वीकार करता है कि वह किसी समय ईसाई बना,
बाद में हिन्दू धर्म में लौटा।
यह घटना न तो फतेहपुर चर्च की घटना से जुड़ी है,
न किसी अन्य याचिकाकर्ता से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित।”

निर्णय:
एफ.आई.आर. 47/2023 को भी रद्द करने का कोई आधार नहीं है।


🔹 5️⃣ एफ.आई.आर. 538/2023 (प्रयागराज की घटना)

“यह एफ.आई.आर. हिंसा, धमकी और उगाही जैसे गंभीर आरोपों से संबंधित है।
यद्यपि यह बाद की घटना है, परंतु यह पूरी तरह स्वतंत्र अपराध है।”

निर्णय:
एफ.आई.आर. 538/2023 और उससे जुड़ी चार्जशीट वैध और यथावत रहेंगी।


🔹 6️⃣ धारा 482 CrPC के अंतर्गत हस्तक्षेप का प्रश्न

न्यायालय ने कहा —

“यह न्यायालय केवल उन्हीं मामलों में एफ.आई.आर. रद्द कर सकता है
जहाँ मामला पूरी तरह से झूठा, दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से असंभव प्रतीत हो।”

“यहाँ आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अभियोजन निराधार है।”

इसलिए:

“धारा 482 CrPC के अंतर्गत कोई हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।”


🔹 7️⃣ संविधानिक दृष्टि से टिप्पणी

“संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है,
लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं कि वह दूसरों को दबाव, धोखे या लालच देकर धर्म बदलवाए।”

“राज्य का यह कर्तव्य है कि वह सामाजिक एकता और धार्मिक सद्भाव की रक्षा करे।”

“धर्मांतरण यदि स्वैच्छिक है, तो कोई अपराध नहीं;
परंतु यदि उसमें प्रलोभन, भय या असत्य कथन हो,
तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि संविधान की भावना के भी विरुद्ध है।”


🔹 8️⃣ न्यायालय के निर्देश

1️⃣ सभी याचिकाएँ, जिनमें एफ.आई.आर. रद्द करने की मांग की गई थी, खारिज की जाती हैं।
2️⃣ एफ.आई.आर. संख्या 224/2022 को अमान्य माना गया,
परंतु यह आदेश केवल इस एफ.आई.आर. तक सीमित रहेगा।
3️⃣ बाकी सभी एफ.आई.आर. (47/2023, 54/2023, 55/2023, 60/2023, 538/2023)
वैध घोषित की जाती हैं।
4️⃣ राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि
अभियुक्तों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो
और जांच निष्पक्ष रूप से पूरी हो।
5️⃣ अभियुक्त यदि उचित समझें, तो निचली अदालत में
जमानत अथवा आरोपमुक्ति (discharge) के लिए आवेदन कर सकते हैं।


🔹 9️⃣ अंतिम निष्कर्ष (Conclusion)

“सभी आपराधिक याचिकाएँ और विशेष अनुमति याचिकाएँ (SLPs) अस्वीकार की जाती हैं।
कोई आदेश लागत (costs) के संबंध में पारित नहीं किया जाता।”


🔹 10️⃣ न्यायालय की टिप्पणी (Obiter)

“यह न्यायालय यह दोहराता है कि
धार्मिक स्वतंत्रता भारत के संविधान की आत्मा है,
परंतु यह स्वतंत्रता दूसरों की स्वतंत्रता को कुचलकर नहीं दी जा सकती।”

“राज्य को यह दायित्व सौंपा गया है
कि वह कमजोर वर्गों को किसी भी प्रकार के मानसिक, आर्थिक या सामाजिक दबाव से
संरक्षण प्रदान करे।”


⚖️ अंतिम आदेश (Order)

“इन याचिकाओं को अस्वीकार किया जाता है।
सभी लंबित अंतरिम आवेदन भी निष्प्रभावी हो जाते हैं।”


🕊️ (न्यायमूर्ति संजय करोल)
🕊️ (न्यायमूर्ति संजय कुमार)
नई दिल्ली, दिनांक 23 अक्टूबर 2025


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