Satendra Babu v. State of Uttar Pradesh (2023)
तथ्य-परिचय
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इस मामले में अभियुक्त जेल में था और चूंकि पुलिस-प्रशासन ने उसे ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं किया, जिसके कारण ट्रायल या अन्य सुनवाई में देरी हुई। SCC Online+1
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अभियुक्त जेल में है, तो उसकी पेशी का दायित्व पुलिस/प्रशासन का है — अगर पुलिस लापरवाही करे तो अभियुक्त को उसकी वजह से दण्ड नहीं भुगतना चाहिए। Lead India Law+1
न्यायालय की व्याख्या
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कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अभियुक्त को “बेदखली/दण्ड” नहीं मिलना चाहिए अगर पेशी-अस्वीकार या ट्रायल में देरी उसकी ही गलती नहीं है। SCC Online
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यह भी कहा गया कि पुलिस द्वारा अभियुक्त को नहीं प्रस्तुत करना, अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं न्यायसुनवाई का अधिकार प्रभावित कर सकती है।
निष्कर्ष / निर्देश
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यदि अभियुक्त जेल में है, तो यह पुलिस कर्मियों की जिम्मेदारी है कि उसे समय-समय पर प्रस्तुत करें।
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यदि प्रस्तुत नहीं किया गया और उसके कारण अभियुक्त को कोई नुकसान हुआ है (जैसे ट्रायल देरी, जमानत ना मिलना), तो वह उस कारण से प्रभावित नहीं होगा।
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इस तरह के मामलों में अभियुक्त के वकील को यह तर्क उठाना चाहिए कि “पेशी-अस्वीकृति/प्रस्तुति-विलंब पुलिस-कर्मी की गलती है, न कि अभियुक्त की”।
वकील-प्रयोग हेतु टिप्स
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किसी अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट में पेश नहीं किया गया और वह जेल में है, तो आप इस निर्णय को उद्धृत कर सकते हैं।
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बेल/रिव्यू अर्जी में यह बताना लाभदायक होगा कि “मैं प्रस्तुत नहीं हुआ क्योंकि मुझे पुलिस द्वारा कोर्ट में नहीं लाया गया” — और इसे वजह नहीं बनाकर अभियुक्त पर दोष न लगाया जाए।
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पुलिस एवं जमानत-प्रक्रिया में देरी पर यह निर्णय वकील के लिए एक मजबूत बँद बना सकता है।
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