बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

Central Bureau of Investigation v. Dr R.R. Kishore (2023)-कोर्ट ने कहा कि जब कोई कानून संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, यानी वह Part III (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो उसे मात्र आगे से नहीं, बल्कि उसके लागू होने के दिन से ही अवैध एवं अमल नहीं किया जाने योग्य माना जाएगा

 

Central Bureau of Investigation v. Dr R.R. Kishore (2023)

तथ्य-परिचय

  • मामला यह था कि Central Bureau of Investigation (CBI) ने Dr R.R. Kishore नामक व्यक्ति के विरुद्ध भ्रष्टाचार प्रतिबंधक अधिनियम (Prevention of Corruption Act, 1988) के अंतर्गत कार्रवाई की थी। CaseMine+2Indian Kanoon+2

  • विवाद यह था कि Delhi Special Police Establishment Act, 1946 (DSPE Act) की धारा 6A(1) के अंतर्गत यह प्रावधान था कि केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना उस स्तर (Joint Secretary एवं ऊपर) के अधिकारियों के विरुद्ध जाँच/अन्वेषण नहीं किया जा सकता। CaseMine+2Verdictum+2

  • इस प्रावधान के विरुद्ध पहले भी उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट में विवाद था कि यह संवैधानिक रूप से ठीक है या नहीं, विशेषकर समानता अधिकार (Article 14) एवं अन्य मौलिक अधिकारों के संदर्भ में। Verdictum+1

  • सुप्रीम कोर्ट ने 11 सितंबर 2023 को यह निर्णय दिया कि धारा 6A(1) असंवैधानिक है और उसे शुरुआत से (void ab initio) लागू माना जाना चाहिए। CaseMine+2CaseMine+2

न्यायालय की व्याख्या

  • कोर्ट ने कहा कि जब कोई कानून संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, यानी वह Part III (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो उसे मात्र आगे से नहीं, बल्कि उसके लागू होने के दिन से ही अवैध एवं अमल नहीं किया जाने योग्य माना जाएगा। Lexology+1

  • इस तरह की घोषित असंवैधानिकता का प्रभाव पीछे तक जाता है — मतलब, उस कानून द्वारा किए गए प्रावधान/अन्वेषण/ कार्रवाई भी प्रभावित हो सकते हैं। Metalegal Advocates

  • कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की अवधारणा (retrospective invalidity) Article 20(1) (केवल दण्ड से संबंधित) के अंतर्गत नहीं आती क्योंकि यह मामला जाँच-अन्वेषण का था, न कि सीधे विवेचना के बाद सजा देने का। Scribd

निष्कर्ष / निर्देश

  • धारा 6A(1) DSPE Act को लागू दिन से ही अमान्य माना गया। अर्थात्- जो भी कार्रवाई इस धारा के प्रावधान के आधार पर की गई थी, उस पर सवाल उठ सकता है। sadalawpublications.com+1

  • इस प्रकार, यदि कोई सरकारी/अधिकारिक कार्रवाई हुई है जिसमें पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई हो, तो अभियुक्त/संलग्न पक्ष उसे चुनौती दे सकता है कि धारा ही वैध नहीं थी।

  • न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक न्याय के लिए “जो गलत था उसे पीछे से ठीक करना” संभव है।

 

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