**सुप्रीम कोर्ट की बड़ी अपडेट: सीनियर एडवोकेट डिज़िग्नेशन की नई गाइडलाइंस 2026 और ज्यूडिशियल एग्जाम में आंसर की पर सख्त रुख**
नमस्ते दोस्तों,
भारतीय न्यायपालिका में पारदर्शिता और मेरिट को बढ़ावा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट लगातार सक्रिय है। 12 फरवरी 2026 को LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं जो वकीलों और न्यायिक सेवा उम्मीदवारों दोनों को प्रभावित करेंगे। एक तरफ सीनियर एडवोकेट बनने की प्रक्रिया को और ऑब्जेक्टिव बनाने वाली नई गाइडलाइंस जारी हुई हैं, तो दूसरी तरफ हाईकोर्ट को ज्यूडिशियल सर्विस एग्जाम में आंसर की खुद चेक करने से रोका गया है।
आइए विस्तार से समझते हैं इन दोनों खबरों को।
1. सीनियर एडवोकेट डिज़िग्नेशन: पॉइंट सिस्टम और इंटरव्यू को अलविदा!
सुप्रीम कोर्ट ने “**Guidelines for Designation of Senior Advocates by the Supreme Court of India, 2026**” नोटिफाई कर दी हैं। ये गाइडलाइंस 13 मई 2025 के *जितेंद्र @ कल्ला बनाम राज्य (NCT दिल्ली)* फैसले के आधार पर 2023 की पुरानी गाइडलाइंस की जगह लेंगी।
*मुख्य बदलाव क्या हैं?**
- **पॉइंट सिस्टम और इंटरव्यू खत्म**: पहले पॉइंट्स के आधार पर मूल्यांकन होता था और इंटरव्यू भी लिया जाता था, लेकिन कोर्ट ने इसे “अप्रैक्टिकल” बताते हुए हटा दिया।
- **परमानेंट कमेटी का गठन**: अब सीनियर एडवोकेट डिज़िग्नेशन की पूरी प्रक्रिया एक स्थायी कमेटी संभालेगी, जिसमें शामिल होंगे:
- चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (चेयरपर्सन)
- सुप्रीम कोर्ट के दो सबसे सीनियर जज (मेंबर)
इस कमेटी को एक परमानेंट सेक्रेटेरिएट की मदद मिलेगी।
- **आवेदन प्रक्रिया**:
- हर साल कम से कम एक बार आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे।
- न्यूनतम 21 दिन का समय दिया जाएगा।
- आवेदनों को वेबसाइट पर पब्लिश किया जाएगा और स्टेकहोल्डर्स को 15 दिन में सुझाव देने का मौका मिलेगा।
**एलिजिबिलिटी शर्तें**:
- वकील के रूप में कम से कम **10 साल का अनुभव** (या वकील + जिला जज/ट्रिब्यूनल ज्यूडिशियल मेंबर के रूप में कुल 10 साल)।
- मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस।
- न्यूनतम उम्र **45 साल** (फुल कोर्ट छूट दे सकता है)।
- कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड या प्रोफेशनल मिसकंडक्ट नहीं होना चाहिए।
**मूल्यांकन के आधार**:
- **काबिलियत**: कानूनी ज्ञान, एडवोकेसी स्किल्स, लीगल राइटिंग और पब्लिकेशन।
- **बार में स्टैंडिंग**: निष्पक्षता, शिष्टाचार, जूनियर्स की मेंटरिंग, प्रो-बोनो काम और ईमानदारी।
- **विशेषज्ञता**: आर्बिट्रेशन, इन्सॉल्वेंसी, आईपीआर, टैक्सेशन आदि क्षेत्रों में एक्सपर्टीज।
**फैसला कैसे होगा?**
- फुल कोर्ट में आम सहमति से या बहुमत से फैसला।
- बिना आवेदन के भी योग्य वकील को डिज़िग्नेट किया जा सकता है।
- रिजेक्शन के बाद 2 साल बाद रिव्यू का मौका, टालने पर 1 साल का इंतजार।
**पूर्व हाईकोर्ट जजों के लिए विशेष प्रावधान**:
- रिटायरमेंट के बाद वे रिक्वेस्ट-कम-कंसेंट लेटर से डिज़िग्नेशन मांग सकते हैं, लेकिन अगर कोई फुल-टाइम असाइनमेंट चला रहा है तो नहीं।
**डिज़िग्नेशन वापस लेने का प्रावधान** भी रखा गया है, जिसमें सुनवाई का मौका दिया जाएगा।
ये बदलाव सीनियर डिज़िग्नेशन को ज्यादा पारदर्शी, मेरिट-बेस्ड और कम सब्जेक्टिव बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
2. ज्यूडिशियल सर्विस एग्जाम: हाईकोर्ट सुपर-एग्जामिनर नहीं बन सकता
दूसरी बड़ी खबर झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (JPSC) के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) एग्जाम से जुड़ी है।
सुप्रीम कोर्ट (CJI सूर्यकांत की बेंच) ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया जिसमें तीन सवालों (नंबर 8, 74 और 96) के जवाब गलत माने गए थे।
**कोर्ट का सख्त संदेश**:
- हाईकोर्ट जज खुद आंसर की की दोबारा जांच नहीं कर सकते। उन्हें **सुपर-एग्जामिनर** की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।
- विवादित सवालों की जांच के लिए **डोमेन एक्सपर्ट्स** (जैसे लॉ प्रोफेसर) की कमेटी बनानी होगी।
- हाईकोर्ट को सिर्फ निर्देश देना है, खुद फैसला नहीं थोपना है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही सवाल ज्यूडिशियल सर्विस से संबंधित हों, फिर भी एक्सपर्ट कमेटी ही अंतिम फैसला करेगी।
निष्कर्ष: न्यायपालिका की मजबूती की दिशा में कदम
ये दोनों फैसले दिखाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट न्यायिक प्रक्रियाओं को ज्यादा ऑब्जेक्टिव, पारदर्शी और एक्सपर्ट-ड्रिवन बनाने पर जोर दे रहा है। सीनियर एडवोकेट डिज़िग्नेशन में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह कम करने और एग्जाम प्रक्रिया में हस्तक्षेप की सीमा तय करने से आम जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा।
**आपकी राय क्या है?**
क्या नई गाइडलाइंस से सीनियर एडवोकेट बनना आसान या मुश्किल हो जाएगा? कमेंट में जरूर बताएं।
**टैग्स**: सुप्रीम कोर्ट, सीनियर एडवोकेट, ज्यूडिशियल सर्विस एग्जाम,
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**जय भारत!** ⚖️
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